एक स्त्री की थकान, उम्मीद और अपने होने की तलाश
लेखिका: प्रियंका शाह, मुजफ्फरपुर
यह कविता एक ऐसी स्त्री की मनःस्थिति को व्यक्त करती है जो रोज़मर्रा की बहसों, समझौतों और संघर्षों से थक चुकी है। वह अपने अस्तित्व, सम्मान और सपनों को जीने की चाह रखती है। यह केवल एक महिला की कहानी नहीं, बल्कि समाज की अनेक महिलाओं की अनकही भावनाओं की आवाज़ है।
हाँ… मैं थक गई हूँ
इन रोज़-रोज़ की बहसों और उलझनों से।
थक गई हूँ तुम्हें समझाने से,
और ख़ुद को बहलाने से।
थक गई हूँ
तुम्हें मनाने की कोशिशों से,
अपने आँसुओं को छुपाने से,
और हर बार टूटकर फिर से संभलने से।
अब बस… जीना चाहती हूँ मैं
अपने लिए… अपने सपनों के लिए।
दिल में अनकहे शब्दों का मेला है,
कहने की भी चाहत है
और सुने जाने की भी।
इन आँखों में एक प्यास है—
चाहतों को देखने की भी आस है
और सामने देखे जाने की भी।
मैं थक गई हूँ
रोज़ की बातों और रोज़ की लड़ाइयों से।
थक गई हूँ तुम्हें भी
और ख़ुद को भी समझाने से।
थक गई हूँ तुम्हें मनाने,
बताने और जताने से,
और बार-बार गिड़गिड़ाने से।
अब बस… जीना चाहती हूँ मैं
ख़ुद के लिए…
अपनी साँसों के लिए।
दिल में बहुत-सी बातें हैं
जो कहने को तरस रही हैं
और सुनने को भी।
इन आँखों में एक प्यास है—
देखने की भी
और देखे जाने की भी।
हाँ… मैं फिर से थक गई हूँ
रोज़ की बातों और रोज़ की लड़ाइयों से।
थक गई हूँ तुम्हें
और ख़ुद को समझाने से।
थक गई हूँ तुम्हें मनाने,
बातें दोहराने, आँसू बहाने,
और हर बार गिड़गिड़ाने से।
अब बस जीना चाहती हूँ मैं
अपने लिए…
अपनी इच्छा के लिए।
दिल में ढेर सारी बातें हैं,
कहने और सुनने की चाहत है।
आँखों में एक प्यास है—
देखने की भी
और देखे जाने की भी।
पर अब…
जो भी होगा, चुपचाप होगा,
बिन कहे, बिन लड़े,
बस दिल में एक सुकून छोड़ जाएगा। 🌿






