✍️अप्पन समाचार टोली
बिहार में इन दिनों मक्के की अच्छी पैदावार देखने को मिल रही है। खेतों में सुनहरे भुट्टों की फसल किसानों के चेहरे पर खुशी ला रही है। लेकिन फसल कटाई के बाद खेतों में बचने वाले सूखे डंठलों और पत्तों को किसान सीधे आग लगाकर जला दे रहे हैं। ग्रामीण बताते हैं कि यह तरीका यहां कई वर्षों से चलता आ रहा है। अधिकतर किसानों को यह जानकारी नहीं है कि मक्के के अवशेष जलाने से पर्यावरण, मिट्टी और स्वास्थ्य पर गंभीर असर पड़ता है।
गांव के कई किसानों का कहना है कि कटाई के बाद खेत जल्दी खाली करने के लिए वे डंठलों (ठठेरा)को जला देते हैं। इससे अगली फसल की तैयारी आसान हो जाती है। किसानों के अनुसार, डंठल हटाने में समय और मजदूरी दोनों अधिक लगती है। इसलिए आग लगाना उन्हें सबसे आसान तरीका लगता है। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि यह आदत भविष्य में खेती और पर्यावरण दोनों के लिए नुकसानदायक साबित हो सकती है।

खेतों से उठता धुआं बना चिंता का कारण
मक्के के सूखे अवशेष जलाने से खेतों में घना धुआं फैल जाता है। यह धुआं आसपास के गांवों तक पहुंचता है और हवा की गुणवत्ता को खराब करता है। धुएं में मौजूद जहरीले कण सांस के जरिए शरीर में पहुंचकर कई बीमारियों का कारण बन सकते हैं। बच्चों, बुजुर्गों और सांस संबंधी मरीजों पर इसका असर सबसे ज्यादा पड़ता है।
विशेषज्ञ बताते हैं कि फसल अवशेष जलाने से कार्बन डाइऑक्साइड, कार्बन मोनोऑक्साइड और अन्य हानिकारक गैसें निकलती हैं। ये गैसें पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने के साथ जलवायु परिवर्तन को भी बढ़ावा देती हैं। यही कारण है कि अब फसल अवशेष जलाने की समस्या केवल गांवों तक सीमित नहीं रही, बल्कि यह पर्यावरण संरक्षण से जुड़ा बड़ा मुद्दा बन चुकी है।
मिट्टी की उर्वरता हो रही नष्ट
मुजफ्फरपुर जिलान्तर्गत मोतीपुर प्रखंड के मोरसंडी गांव के कई किसान (नाम नहीं छापने की शर्त पर) बताते हैं कि डंठल जलाने से खेत साफ हो जाता है, लेकिन उन्हें यह पता नहीं होता कि आग मिट्टी की ऊपरी परत को भी नुकसान पहुंचाती है। खेत की मिट्टी में मौजूद उपयोगी जीवाणु और सूक्ष्म पोषक तत्व आग की गर्मी से नष्ट हो जाते हैं। इससे धीरे-धीरे जमीन की उर्वरता कम होने लगती है।
पारू प्रखंड के चांदकेवारी के किसान प्रमोद भगत बताते हैं कि एक दशक पहले तक किसान मक्के की कटाई के बाद खुट्टी/ठठेरा खेतों में ही छोड़ देते थे। वर्षा शुरू होने से पहले किसान लोहिया (हल) या कुदाल की मदद से खुट्टी, डंठल और ठठेरा को मिट्टी में मिला देते थे। खरीफ फसल, विशेषकर धान की बुआई से पहले ये अवशेष मिट्टी में सड़कर कम्पोस्ट (खाद) बन जाते थे। इससे मिट्टी की उर्वरा शक्ति बढ़ती थी और फसल हरी-भरी तथा बेहतर होती थी। हालंकि कुछ किसान खुट्टी की जड़ को कुदाल से निकल कर ट्रेक्टर या हल चलाकर मिट्टी में ही छोड़ देते है।

कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार, लगातार अवशेष जलाने से मिट्टी की नमी कम होती है और भविष्य में फसल उत्पादन पर असर पड़ सकता है। यानी आज खेत साफ दिख सकता है, लेकिन आने वाले वर्षों में खेती की लागत बढ़ सकती है और उत्पादन घट सकता है।
किसानों को नहीं मिल रही सही जानकारी
ग्रामीणों का कहना है कि किसानों को मक्के के अवशेष के वैकल्पिक उपयोग के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं दी गई है। कई किसान यह भी बताते हैं कि यदि उन्हें आसान और सस्ता विकल्प मिले तो वे डंठल जलाना बंद कर सकते हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि गांव स्तर पर जागरूकता अभियान चलाने की जरूरत है। अगर किसानों को बताया जाए कि मक्का अवशेष भी खेती के लिए उपयोगी संसाधन बन सकता है, तो वे इसे जलाने के बजाय दूसरे कामों में इस्तेमाल कर सकते हैं।
मक्के का डंठल का क्या हो सकता है उपयोग?
मक्के के डंठल और पत्तों का उपयोग कई तरीके से किया जा सकता है। इन्हें खेत में सड़ाकर जैविक खाद बनाया जा सकता है, जिससे मिट्टी की उर्वरता बढ़ती है। इसके अलावा पशु चारा, मल्चिंग और बायोगैस उत्पादन में भी इसका उपयोग संभव है।
कुछ किसान अब आधुनिक मशीनों की मदद से फसल अवशेष को मिट्टी में मिलाकर प्राकृतिक खाद तैयार कर रहे हैं। इससे खेत की गुणवत्ता बेहतर होती है और रासायनिक खाद पर निर्भरता भी कम होती है।
जागरूकता से बदल सकती है स्थिति
मोतीपुर समेत कई प्रखंडों के किसानों को समय-समय पर प्रशिक्षण और जानकारी दी जाए, तो फसल अवशेष जलाने की समस्या काफी हद तक कम हो सकती है। गांव स्तर पर कृषि विभाग और स्थानीय संस्थाओं को किसानों तक सही जानकारी पहुंचाने की जरूरत है।
आज जरूरत इस बात की है कि किसान अच्छी पैदावार के साथ पर्यावरण संरक्षण को भी महत्व दें। खेतों में डंठल जलाना आसान जरूर लगता है, लेकिन इसके नुकसान लंबे समय तक असर छोड़ सकते हैं। यदि किसान वैकल्पिक उपाय अपनाएं, तो खेती भी सुरक्षित रहेगी और पर्यावरण भी स्वच्छ बना रहेगा।
FAQ – मक्का अवशेष जलाने से जुड़े सवाल
1. किसान मक्का के डंठल क्यों जलाते हैं?
किसान खेत जल्दी खाली करने, मजदूरी बचाने और अगली फसल की तैयारी आसान बनाने के लिए मक्का के डंठल जलाते हैं।
2. मक्का अवशेष जलाने से क्या नुकसान होता है?
इससे वायु प्रदूषण बढ़ता है, मिट्टी की उर्वरता कम होती है और स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं पैदा हो सकती हैं।
3. क्या मक्का के डंठल जलाने से मिट्टी खराब होती है?
हाँ, आग लगने से मिट्टी के उपयोगी जीवाणु और पोषक तत्व नष्ट हो जाते हैं, जिससे जमीन की गुणवत्ता प्रभावित होती है।
4. मक्का अवशेष का वैकल्पिक उपयोग क्या है?
मक्का अवशेष से जैविक खाद, मल्चिंग, पशु चारा, बायोगैस और बायोचार बनाया जा सकता है।
5. फसल अवशेष जलाने से पर्यावरण पर क्या असर पड़ता है?
इससे धुआं और जहरीली गैसें निकलती हैं, जो वायु प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन को बढ़ावा देती हैं।
6. किसानों को अवशेष जलाने से रोकने के लिए क्या जरूरी है?
किसानों को जागरूक करना, वैकल्पिक तकनीक बताना और सरकारी स्तर पर प्रशिक्षण व सहायता उपलब्ध कराना जरूरी है।
7. बिहार के किन क्षेत्रों में मक्का अवशेष जलाने की समस्या देखी जा रही है?
बिहार के कई ग्रामीण इलाकों में किसान खेतों में मक्का डंठल जला रहे हैं।
8. क्या मक्का अवशेष जलाने से स्वास्थ्य पर असर पड़ता है?
हाँ, इससे निकलने वाला धुआं सांस लेने में परेशानी, आंखों में जलन और अन्य श्वसन संबंधी बीमारियों का कारण बन सकता है।











