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काॅलेज तक नहीं पहुंच पाती हैं सिमरा गांव की अधिकतर लड़कियां

अनिता राम अप्पन समाचार की पहली टीम के साथ कम्युनिटी रिपोर्टर के रूप में जुड़ी थीं. वे मुज़फ्फरपुर जिले के सोहांसा गांव की रहने वाली एक दलित परिवार की बेटी है. अप्पन समाचार से जुड़ने के बाद अनिता ने ग्रामीण महिलाओं, शिक्षा और सामाजिक मुद्दों पर सक्रिय रूप से काम किया. लगभग दो-तीन वर्षों बाद उनकी शादी मुज़फ्फरपुर जिले के मोतीपुर प्रखंड के सिमरा गांव में हो गई. विवाह के बाद घरेलू जिम्मेदारियों के कारण अप्पन समाचार से कुछ समय के लिए जुड़ाव कम हो गया. लंबे अंतराल के बाद अनिता ने एक बार फिर लेखन की ओर कदम बढ़ाया

काॅलेज तक नहीं पहुंच पाती हैं सिमरा गांव की अधिकतर लड़कियां
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✍️अनिता राम

बिहार के मुज़फ्फरपुर जिले के मोतीपुर प्रखंडन्तर्गत सिमरा गांव का दलित टोला आज भी अशिक्षा के अंधेरे में डूबा है. सामाजिक जागरूकता की कमी इस राह में बड़ी बाधा है. हम सभी जानते हैं कि शिक्षा मानव जीवन की सबसे बड़ी व अमूल्य पूंजी है. यह मनुष्य को ज्ञान प्रदान करती है, सही और गलत का अंतर समझाती है तथा जीवन में आगे बढ़ने का मार्ग दिखाती है. शिक्षा के माध्यम से ही व्यक्ति के विचारों का विकास होता है और समाज में समानता, जागरूकता तथा आत्मविश्वास का निर्माण होता है. इसलिए कहा जाता है कि शिक्षा के बिना मनुष्य का जीवन अधूरा है.

सिमरा गांव के दलित टोले में पहले लड़के और लड़कियों की पढ़ाई बहुत कम होती थी. लगभग 50 से 60 प्रतिशत बच्चे ही विद्यालय तक पहुंच पाते थे. आज स्थिति में कुछ सुधार अवश्य हुआ है, फिर भी अधिकतर बच्चे प्राथमिक या माध्यमिक शिक्षा के बाद पढ़ाई छोड़ देते हैं. बहुत कम लड़के-लड़कियां इंटर, स्नातक, आईटीआई या उससे आगे की शिक्षा प्राप्त कर पाते हैं. विशेष रूप से लड़कियों की स्थिति आज भी चिंताजनक है. अधिकतर लड़कियां आर्थिक तंगी, सामाजिक दबाव और कम उम्र में विवाह जैसी परिस्थितियों के कारण अपनी पढ़ाई बीच में ही छोड़ने को मजबूर हो जाती हैं.

इसकी सबसे बड़ी वजह केवल आर्थिक कठिनाई नहीं, बल्कि समाज की पुरानी सोच और भेदभावपूर्ण मानसिकता भी है. यदि कोई लड़की घर से बाहर निकलकर पढ़ाई या नौकरी करना चाहती है, तो कई बार उसे लोगों के ताने, आलोचनाएं और गलत धारणाएं झेलनी पड़ती हैं. अपने अधिकारों के लिए बोलना या संघर्ष करना भी कई लोगों को स्वीकार नहीं होता. ऐसी परिस्थितियों में अनेक बेटियों के सपने अधूरे रह जाते हैं. मुज़फ्फरपुर जिले के मोतीपुर प्रखंड के सिमरा गांव की कई लड़कियों ने नाम नहीं छापने की शर्त पर कहा कि हम पढ़ना तो चाहते हैं, लेकिन घर एवं समाज में पढ़ाई का कोई अनुकूल माहौल नहीं है. हमारे माता-पिता गरीब हैं. उतनी कमाई नहीं है कि अपने तीन-चार बच्चों को काॅलेज भेज सके. अब तो बीए पास करने में पूरे सेमेस्टर कम-से-कम 40 हजार रुपए लगते हैं. इतने रुपए वे कहां से दे पाएंगे. इसलिए हम मिड्ल व हाईस्कूल तक पढ़ कर छोड़ चुके हैं.

शिक्षा और जागरूकता के अभाव में हमारा समाज आज भी विकास की मुख्यधारा से पीछे है. जब तक लड़के और लड़कियों को समान अवसर नहीं मिलेंगे, तब तक समाज का समग्र विकास संभव नहीं है. हमें अपनी सोच बदलनी होगी, बेटियों की शिक्षा को महत्व देना होगा और सामाजिक कुरीतियों को समाप्त करना होगा, तभी मोतीपुर प्रखंड के सिमरा गांव का दलित समाज शिक्षा के माध्यम से आगे बढ़ सकेगा और आने वाली पीढ़ियां अपने सपनों को साकार कर सकेंगी.

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