- बाकी दुनिया से कटी एक बस्ती की दास्तान
- पूरी बस्ती में छाया अशिक्षा का घुप्प अंधेरा
- जब भी मॉर्निंग स्कूल की घंटी बजती है, बच्चे खेतों की ओर निकल पड़ते हैं
- न इनके पास जन्म प्रमाण पत्र है और न आधार कार्ड
मड़वन से वंदना कुमारी की रिपोर्ट
सुबह के आठ बज रहे थे. कुछ महिलाएं अपने झोंपड़ीनुमा घरों में मिट्टी के चूल्हे पर खाना बना रही थीं. कुछ पुरुष काम पर निकल चुके थे, तो कुछ इधर-उधर गप्पे मार रहे थे. बच्चे खेल-कूद में मग्न थे अपने स्कूल के बस्ते से बेपरवाह. मलिन बस्ती, मुफलिसी, बेकारी व अशिक्षा का घुप्प अंधेरा, वातावरण में उदासी, मरे हुए सपने और भविष्य को लेकर कोई चिंता नहीं. यह उस बस्ती की तस्वीर है, जो बाकी दुनिया से कटी है. बिहार के विभिन्न जिलों में ऐसी सैकड़ों बस्तियां हैं, जिसे मुसहर टोली के नाम से भी जानते हैं. फिलहाल हम बात कर रहे हैं मुजफ्फरपुर जिले के मड़वन प्रखंड स्थित आरिजपुर मुसहर टोली की.

थक-हार कर घर बैठ गए
रीना देवी के दरवाजे पर कुछ महिलाएं गोलाकार चटाई पर बैठी थीं. पता चला कि एक महिला संगठन की प्रतिनिधि यहां की महिलाओं के साथ पढ़ाई-लिखाई को लेकर बैठक कर रही हैं. बैठक में गनौरी देवी, रूबी देवी, रीना देवी, कतकी देवी, सुनीता देवी, फुलना देवी, बिंदु देवी, ललीता देवी, कलिया देवी, ज्ञानती देवी, राजपतिया देवी समेत करीब दो दर्जन महिलाएं शिरकत कर रही थीं. सभी महिलाएं अपनी-अपनी समस्याएं रख रही थीं.
महिलाओं का कहना था कि इस मुसहर टोली में दो-चार को छोड़कर किसी बच्चे का जन्म प्रमाण पत्र एवं आधार कार्ड नहीं बना है. बहुत सारे व्यस्क लोगों के पास भी आधार कार्ड नहीं है, जिसके कारण सरकारी योजनाओं का लाभ नहीं मिल पाता है. 70 साल की असिया देवी ने बताया कि आधार कार्ड बनाने के लिए 1000 रुपए मांगा. साल भर दौड़ते-दौड़ते थक गये, लेकिन नहीं बना. थक-हार कर छोड़ दिए हैं. कतकी देवी कहती है कि पहले आसानी से आधार कार्ड और जन्म प्रमाण पत्र बन जाता था. अब तो इतना पैसा और कागज मांगता है कि हमलोग परेशान होकर छोड़ देते हैं.

रीना देवी से सीखने की जरूरत
जन्म प्रमाण पत्र और आधार कार्ड के कारण भी बच्चों का स्कूल में नामांकन नहीं हो पाता है. यह अलग बात है कि मेरे परिवार में लगभग सभी के पास आधार कार्ड है, क्योंकि हम शुरू से थोड़ा जागरूक हैं. यह कहना है रीना देवी का. रीना कहती हैं कि मेरे चार बच्चे हैं. एक बेटी इंटर तक पढ़ी है, जिसकी शादी कर दिए हैं. एक बेटी नौवीं तक पढ़ सकी. दोनों बेटा 8-9 तक पढ़़ा. बहु दसवीं तक पढ़ी है. मुसहर टोली में मेरा एकमात्र परिवार है, जो इतना तक पढ़ा-लिखा है. लेकिन यह भी इसलिए संभव हो सका कि मेरे जीवन में एक ऐसी घटना घटी, जो मुझे अपने बच्चों को पढ़ाने के लिए प्रेरित किया.

एक बार मेरा बेटा कालाजार एवं बेटी टीबी से ग्रसित हो गये. दोनों को लेकर में मुजफ्फरपुर शहर के जूरन छपरा में ईलाज कराने गयी. मैं अनपढ़ हूं, जिस कारण जब भी कोई कहता कि रोड नंबर- 2, 4 या 3 में जाइए, तो मैं बोर्ड पढ़ नहीं पाती थी. जब किसी से पूछते, तो वह बता तो देता लेकिन मैं फिर भटक जाती. दोबारा पूछना पड़ता. तभी मैं सोची कि यदि मैं पढ़ी होती तो यह परेशानी नहीं होती. उसी दिन मैंने ठान ली कि यदि मेरा बच्चा बच गया, तो उसे जरूर पढ़ाउंगी. और आज मैं खुश हूं कि मेरे बच्चे बहुत न सही, लेकिन काम चलने लायक तो पढ़ लिया. आज मेरी बहु इस टोले के कुछ बच्चों को बुला-बुला कर पढ़ाने का काम करती है. लेकिन अफसोस है कि और परिवार के बच्चे अब भी शिक्षा से दूर है.
मड़वन निवासी मो. तैय्यब टोटो चालक है. तैय्यब ने कहा कि यहां के अधिकतर लोग दूसरे प्रदेश में काम करते हैं. साल में एक-दो महीने के लिए ही घर आते हैं. इस टोले की महिला बच्चों की पढ़ाई को लेकर जागरूक नहीं हैं. महिलाएं बच्चों को स्कूल भेजती हैं कि नहीं यह उसके पति को पता नहीं चलता है. अपने पति को सही-गलत जो बताती है, वह उसे ही सही मानता है.

हम पुणे में काम करते हैं, पत्नी ध्यान नहीं देती
आरिजपुर मुसहर टोले का 36 वर्षीय गरीबन मांझी ने बताया कि वह पुणे की एक कपड़ा फैक्ट्री में काम करता है. उसके तीन बच्चे हैं. एक बच्चा टोले में स्थित आंगनबाड़ी केंद्र में जाता है. दूसरा बच्चा बगल के प्राइमरी स्कूल में जाता है, लेकिन सप्ताह में सिर्फ एक-दो दिन. बाकी दिन गायब रहता है. बोलता है कि स्कूल में कुछ नहीं मिलता है. घर की महिला जागरूक नहीं है, जिसके कारण यहां के बच्चे स्कूल नहीं जा पाते हैं. हम तो बाहर कमाने चले जाते हैं.
यहां मेरी पत्नी बच्चों को स्कूल भेजती है कि नहीं, मुझे क्या पता? हालांकि, आशा कार्यकर्ता रेखा देवी का कहना है कि इस मुसहर बस्ती में 10-15 सालों में बदलाव देखने को मिला है. तब टीकाकरण के लिए बुलाते थे, तो ये लोग नहीं आते थे. विभिन्न सामाजिक संगठनों के लगातार इस टोले में काम करने के कारण इनमें जागरूकता आई है. अब यहां की महिलाएं बैठकों में आती हैं और टीकाकरण अभियान में भी साथ देती हैं.
रौशन आरा आंगनबाड़ी केंद्र संख्या – 88 की सेविका है. वे बताती हैं कि आज बच्चे अपने माता-पिता के साथ गेहूं कटाई में चले गए हैं. इसलिए संख्या कम है. यहां 35 बच्चे का नाम दर्ज हैं. इन बच्चों के साथ सबसे बड़ी समस्या है आधार कार्ड की. इस बस्ती के अधिकतर बच्चों के पास जन्म प्रमाण पत्र व आधार कार्ड नहीं हैं. कई बच्चों को लेकर मैं खुद प्रखंड ऑफिस गई थी, लेकिन नहीं बना. बताया गया कि अभी नहीं बन रहा है. ऐसे में इन बच्चों का नामांकन कैसे होगा? आप ही बताइये.
स्कूल जाने से क्या मिलेगा, कमाएंगे तो 200 रुपए मिलेंगे
आरिजपुर मुसहर टोला से सटे उत्तरी छोड़ पर स्थित प्राथमिक विद्यालय में मुसहर समुदाय के कुछेक बच्चे ही पढ़ते हैं. शेष बच्चे दूसरे समुदाय के हैं. कन्हैया ठाकुर बतौर प्रधानाध्यापक पिछले साल जुलाई में इस स्कूल का कार्यभार संभाला है. उनका कहना है कि यहां के बहुत कम बच्चे पढ़ने आते हैं. हम अभिवंचित वर्ग से आनेवाले इन बच्चों को स्कूल से जोड़ना चाहते हैं. अभी तो कुछ महीने पहले ही आए हैं. यह मेरा पहला सेसन होगा. मैंने आंगनबाड़ी केंद्र से सहयोग करने के लिए बोला था, कुछ डाटा भी शेयर करने को कहा था, लेकिन अभी तक कोई सहयोग नहीं मिला. फिर से बोलूंगा.

बातचीत को आगे बढ़ाते हुए एचएम कन्हैया ठाकुर कहते हैं कि मेरे स्कूल में 5 शिक्षक हैं. हमें सभी टीचर का भरपूर सपोर्ट मिल रहा है. लेकिन अफसोस है कि मांझी समुदाय के अभिभावकों की बच्चों को पढ़ाने में कोई रुचि नहीं हैं. वे सोचते हैं कि स्कूल में क्या मिलता है? बेटा-बेटी एक दिन ईंट-भट्ठा पर कमाएगा, तो 200 रुपए मिलेंगे. वे आज की सोचते हैं, कल की नहीं. उन्हें बच्चों के भविष्य की कोई चिंता नहीं है. इस साइकोलाॅजी को मैं तोड़ना चाहता हूं. गरीबी व अशिक्षा के साथ-साथ सरकारी स्कीम तक उनकी पहुंच का न होना, शिक्षा की राह में एक बड़ी बाधा है.
एक महिला फेडरेशन के लिए काम करने वाली मृदुला कुमारी कहती है कि दलित-महादलित बस्ती के काफी बच्चे स्कूल से बाहर हैं, इसका प्रमुख कारण तो शिक्षा के प्रति अभिभावकों में जागरूकता की कमी है. लेकिन जो बच्चे पढ़ना चाहते हैं, उनके समक्ष जन्म प्रमाण पत्र एवं आधार कार्ड का न बन पाना एक बड़ी समस्या है. मैं खुद ऐसे बच्चों की लिस्ट लेकर मड़वन के बीडीओ से मिलकर समस्या बताई, लेकिन अभी तक समाधान नहीं निकल सका है. आधार कार्ड बनवाने के लिए गांव के लोग दर-दर भटक रहे हैं, लेकिन नहीं बन रहा है. वे ठगी के शिकार भी हो जाते हैं. प्रखंडों में आधार सेंटर की कमी है.
(इनपुट : यशोदा कुमारी पासवान व तस्वीरें : एएस)










