मुजफ्फरपुर के गाँवों की ज़मीनी हकीकत
✍️ रिपोर्ट: सिमरन सहनी
बिहार के मुजफ्फरपुर जिले से लगभग 55–60 किलोमीटर दूर साहेबगंज प्रखंड के हुस्सेपुर जोरा कान्ही और उसके आसपास के गाँवों के किसान इन दिनों गहरे संकट से गुजर रहे हैं। खेतों में खड़ी गेहूं की फसल भले ही अच्छी दिखाई दे रही हो, लेकिन इसकी असल तस्वीर कहीं अधिक चिंताजनक है। बढ़ती लागत, अनिश्चित मौसम और फसल का उचित मूल्य न मिल पाना—इन तीनों ने किसानों की हालत को मुश्किल बना दिया है।

“इस साल फसल तो ठीक हुई, लेकिन लागत और मेहनत इतनी बढ़ गई कि फायदा नाम का कुछ नहीं बचा।” — स्थानीय किसान
खेती की बढ़ती लागत: छोटे किसानों पर सबसे ज्यादा असर
स्थानीय किसान चंदन साहनी बताते हैं कि एक कट्ठा खेत में खेती करने के लिए लगभग 3 किलो बीज, 2 किलो डीएपी, 1 किलो यूरिया और आधा किलो पोटाश डालना पड़ता है। इसके अलावा सिंचाई और मजदूरी का खर्च अलग से जुड़ जाता है। ऐसे में छोटी जोत वाले किसानों के लिए खेती करना अब महंगा सौदा बनता जा रहा है। जिन किसानों के पास सीमित जमीन है, उनके लिए लागत निकालना भी चुनौती बन गया है।
अनिश्चित मौसम ने बढ़ाई मुश्किलें
मौसम की अनिश्चितता ने स्थिति को और जटिल बना दिया है। समय पर बारिश न होना, अचानक तेज बारिश हो जाना और लंबे समय तक सूखा बने रहना—इन सबने खेती की पूरी प्रक्रिया को प्रभावित किया है। फसल तैयार होने के समय भी बारिश का खतरा बना रहा, जिससे किसानों को अपनी फसल बचाने के लिए मशीनों का सहारा लेना पड़ा।
“मौसम कब बदल जाए, इसका कोई भरोसा नहीं रहा। हर साल जोखिम बढ़ता जा रहा है।” — किसान की प्रतिक्रिया
मशीनों का सहारा, लेकिन बढ़ा खर्च
विकास मित्र संजना कुमारी के अनुसार, इस बार लगभग सभी किसानों ने मजबूरी में मशीनों से गेहूं की कटाई करवाई।
- एक कट्ठा खेत की कटाई का खर्च: लगभग 50-100 रुपये
- दवनी (थ्रेसिंग) का खर्च: करीब 1200 रुपये प्रति घंटा
यह अतिरिक्त खर्च किसानों के लिए आर्थिक बोझ बन गया है।
MSP से कम कीमत: सबसे बड़ी समस्या
इन बढ़ते खर्चों के बीच सबसे बड़ी समस्या है फसल का उचित मूल्य न मिल पाना। किसानों को गेहूं का बाजार भाव केवल 2200 से 2300 रुपये प्रति क्विंटल मिल रहा है, जबकि सरकार द्वारा तय न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) 2585 रुपये प्रति क्विंटल है। यानी किसानों को प्रति क्विंटल 300 से 400 रुपये तक का नुकसान उठाना पड़ रहा है। MSP
“सरकार जो कीमत तय करती है, वह हमें मिलती ही नहीं। फिर खेती कैसे चले?” — किसान
महिला किसानों की बढ़ती चिंता
महिला किसानों की स्थिति भी कम चिंताजनक नहीं है। 45 वर्षीय बीना देवी कहती हैं कि अब खेती में कुछ नहीं रखा है—जितना खर्च करते हैं, उतना भी वापस नहीं मिलता। वहीं रिंकू देवी का कहना है कि खेती में पैसा तो लग जाता है, लेकिन उतनी आमदनी नहीं होती, जिससे घर चलाना मुश्किल हो जाता है।
व्यापक स्थिति: बिहार के किसान संकट में
अगर व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखें, तो बिहार में लगभग 76 प्रतिशत आबादी आज भी कृषि पर निर्भर है और औसत जोत का आकार मात्र 0.39 हेक्टेयर है। पिछले कुछ वर्षों में कृषि लागत में 20 से 30 प्रतिशत तक की वृद्धि दर्ज की गई है, जबकि बड़ी संख्या में किसान अपनी फसल MSP पर बेचने में सक्षम नहीं हो पाते। इससे उनकी आय पर सीधा असर पड़ता है।
सरकार की योजना
हुस्सेपुर जोरा कान्ही और उसके आसपास के गाँवों की यह कहानी यह जरूर दिखाती है कि आज किसान कई चुनौतियों का सामना कर रहे हैं, लेकिन इसके साथ ही यह भी सच है कि सरकार लगातार इन समस्याओं को दूर करने के लिए प्रयास कर रही है। बदलते मौसम, बढ़ती लागत और बाजार की चुनौतियों के बीच किसानों को सहारा देने के लिए कई योजनाएं लागू की गई हैं, जिनका लाभ धीरे-धीरे जमीनी स्तर तक पहुंच रहा है। सरकार का उद्देश्य खेती को अधिक सुरक्षित, आधुनिक और लाभकारी बनाना है, ताकि किसानों की आय में सुधार हो सके और उनका भविष्य मजबूत बने।
बिहार में रबी फसलें सर्दियों (अक्टूबर–नवंबर) में बोई जाती हैं और मार्च–अप्रैल में काटी जाती हैं, जिनमें गेहूं, चना, मसूर, मटर और सरसों प्रमुख हैं। इन फसलों को बढ़ावा देने के लिए सरकार द्वारा बीज अनुदान योजना के तहत सस्ते बीज उपलब्ध कराए जा रहे हैं, डीजल अनुदान योजना से सिंचाई लागत कम की जा रही है, और फसल सहायता योजना के माध्यम से प्राकृतिक आपदा की स्थिति में किसानों को आर्थिक सहयोग दिया जा रहा है। इसके अलावा PM-KISAN योजना के तहत किसानों को हर वर्ष ₹6000 की सहायता सीधे उनके खाते में दी जाती है। इन पहलों के माध्यम से सरकार किसानों को मजबूत बनाने और कृषि क्षेत्र को टिकाऊ एवं लाभकारी बनाने की दिशा में निरंतर काम कर रही है।








