संघर्ष और उम्मीद के बीच खेती: गांव की कहानी
मुजफ्फरपुर (बिहार): जिले से लगभग 55–60 किलोमीटर दूर पारू प्रखंड के अंतर्गत आने वाला चांदकेवारी पंचायत आज भी खेती पर निर्भर एक ऐसा गांव है, जहां कृषि केवल आजीविका का साधन नहीं, बल्कि जीवन का आधार है। सीमित संसाधनों और बढ़ती चुनौतियों के बावजूद यहां के किसान खेती से जुड़े हुए हैं। इस पूरे परिदृश्य में गांव की महिलाओं की भागीदारी विशेष रूप से उल्लेखनीय है।
महिलाओं की मेहनत, खेतों की पहचान
चांदकेवारी में महिलाएं खेती के हर चरण में सक्रिय भूमिका निभाती हैं। बीज बोने से लेकर फसल तैयार करने तक वे बराबरी से जिम्मेदारी उठाती हैं। गांव की महिला किसान विभा देवी बताती हैं कि वर्तमान में अधिकतर परिवार सब्जियों की खेती पर निर्भर हैं।
“खेती करना जरूरी है, लेकिन इसमें लागत ज्यादा और मुनाफा कम है,” वे कहती हैं।
बढ़ती लागत, घटता लाभ
विभा देवी के अनुसार, एक कट्ठा खेत में सब्जी की खेती शुरू करने के लिए करीब 250 रुपये तक बीज पर खर्च आता है, जो किसान खुद वहन करते हैं। सरकारी योजनाओं या कृषि विभाग से उन्हें विशेष सहायता नहीं मिलती।
सिंचाई भी एक बड़ी चुनौती है। मशीन से पानी देने पर लगभग 250 रुपये प्रति घंटा खर्च आता है, जो छोटे किसानों के लिए भारी पड़ता है। एक पूरी फसल तैयार करने में 3000 से 5000 रुपये तक का खर्च हो जाता है, जिसमें बीज, खाद, मजदूरी और सिंचाई शामिल हैं।
बाजार की अनिश्चितता
किसानों के सामने सबसे बड़ी समस्या बाजार में मिलने वाली कीमत है। कई बार सब्जियों के दाम इतने कम मिलते हैं कि लागत निकालना भी मुश्किल हो जाता है।

“कई बार उतना ही पैसा मिलता है, जितना खेत में लगाया होता है,” विभा देवी बताती हैं।
फिर भी नहीं छोड़ते खेती
इन चुनौतियों के बावजूद किसान खेती से पीछे नहीं हटते। वे टमाटर, बैंगन, भिंडी और मिर्च जैसी विभिन्न सब्जियां उगाते हैं, ताकि किसी न किसी फसल से कुछ लाभ मिल सके।
मक्के की खेती भी चुनौतीपूर्ण
गांव के किसान अमरनाथ प्रसाद बताते हैं कि वे मक्के की खेती करते हैं। उनके अनुसार, एक कट्ठा खेत में मक्का उगाने में लगभग 1000–1500 रुपये तक खर्च होता है, जिसमें बीज, खाद और सिंचाई जैसी आवश्यक लागतें शामिल होती हैं।
“अगर मौसम ठीक रहा और बाजार में सही दाम मिला, तो फायदा हो सकता है, वरना सारी मेहनत बेकार चली जाती है,” वे कहते हैं।
खेती: जीवन का अभिन्न हिस्सा
ग्रामीण क्षेत्रों में खेती केवल आर्थिक गतिविधि नहीं, बल्कि जीवन का अहम हिस्सा है। चांदकेवारी पंचायत के किसान कठिन परिस्थितियों में भी अपने खेतों को हरा-भरा बनाए रखने में जुटे हैं।
महिलाओं की अहम भूमिका
गांव की महिलाएं खेतों में काम करने के साथ-साथ घर की जिम्मेदारियां भी निभाती हैं। वे परिवार की आर्थिक स्थिति को मजबूत करने में महत्वपूर्ण योगदान देती हैं। यदि उन्हें सरकारी योजनाओं, प्रशिक्षण और आर्थिक सहायता का उचित लाभ मिले, तो उनकी मेहनत और भी बेहतर परिणाम दे सकती है।
एक गांव, कई कहानियां
चांदकेवारी की यह कहानी केवल एक पंचायत की नहीं, बल्कि बिहार के कई ग्रामीण इलाकों की वास्तविकता को दर्शाती है। यहां के किसान, खासकर महिलाएं, कठिन परिस्थितियों में भी उम्मीद और मेहनत के साथ खेती को आगे बढ़ा रहे हैं। ग्रामीण भारत की यही मेहनत देश की खाद्य सुरक्षा और कृषि परंपरा को मजबूत बनाए रखने में अहम भूमिका निभाती है।
✍️ रिपोर्ट: अप्पन समाचार टोली
- सिमरन सहनी (B.A Arts)
- रिंकल कुमारी (11th)
- काजल कुमारी (11th)
- सपना कुमारी (11th)








