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बेमौसम बारिश-आंधी व ओलावृष्टि ने किसानों की कमर तोड़ दी

बारिश और तेज हवा के कारण खेत में गिरी हुई गेहूं की फसल, पानी से भरे खेत में खड़ा किसान
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असमय बारिश ने तोड़ी किसानों की उम्मीदें

✍️ सिमरन सहनी की रिपोर्ट

🏷️इनपुट : यशोदा कुमारी पासवान (मड़वन),  विजया भारती (बंदरा)

मुजफ्फरपुर. इस समय रबी फसल, विशेषकर गेहूं की कटाई का मौसम चल रहा है. आमतौर पर यह वह समय होता है जब खेतों में सुनहरी फसल लहलहाती है, लेकिन इस बार मौसम ने किसानों की उम्मीदों पर पानी फेर दिया है.

“कटाई के समय हुई बेमौसम बारिश ने किसानों की महीनों की मेहनत एक झटके में बर्बाद कर दी.”

सैकड़ों एकड़ में लगी गेहूं-मक्के की फसल बर्बाद

अचानक हो रही बारिश और तेज़ हवाओं के कारण गेहूं की फसल खेतों में ही गिरकर बर्बाद हो रही है. जिन खेतों में फसल कटाई के लिए पूरी तरह तैयार थी, वहां अब पानी भर गया है, जिससे किसानों के सामने गंभीर समस्या खड़ी हो गई है.

मुजफ्फरपुर समेत कई गांवों की स्थिति

बिहार के मुजफ्फरपुर जिले के हुस्सेपुर गांव, जो लगभग 60–65 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है, सहित आसपास के कई गांवों में यही स्थिति देखने को मिल रही है. हर तरफ किसान एक ही समस्या से जूझ रहे हैं—तैयार फसल का बर्बाद होना. जिले के गायघाट, हथौड़ी, बोचहां, साहेबगंज, औराई, कटरा, मड़वन, मोतीपुर, मीनापुर आदि प्रखंडों के सैकड़ों किसानों की स्थिति एक जैसी है और सभी मौसम की मार से परेशान हैं.

मार्च की बारिश और ओलावृष्टि से बढ़ी परेशानी

बेमौसम बारिश और ओलावृष्टि ने किसानों की चिंता और बढ़ा दी है. मक्का और गेहूं की फसल को भारी नुकसान हुआ है. पहले से ही महंगे बीज और खाद के कारण लागत बढ़ी हुई थी, और अब कटाई के समय हुई बारिश ने किसानों की मेहनत पर पानी फेर दिया है.

जिले के मड़वन प्रखंड के चमरुआ गांव के किसान धरीक्षण राम बताते हैं कि मेरी पूरी मेहनत बेकार हो गई. हमने ब्याज पर रुपये लेकर खेती की थी. फसल अच्छी थी, लेकिन अचानक हुई बारिश ने सब बर्बाद कर दिया.

सब्जी किसानों पर भी मौसम की मार

बंदरा प्रखंड के रतवारा गांव के किसान अजय कुशवाहा ने बताया कि असमय बारिश एवं ओलावृष्टि के कारण गाजर व चुकंदर के किसानों को भी नुकसान होगा. उन्होंने कहा कि मैंने दो एकड़ जमीन में गाजर की खेती की है. बंदरा में गाजर व चुकंदर की बड़े पैमाने पर खेती होती है. जिन खेतों में पानी जमा हो गया है, उसमें लगी गाजर की फसल धूप निकलने के साथ गलना शुरू हो जाएगी, जिससे किसानों को काफी नुकसान होगा.

मीनापुर में भारी तबाही :

आंधी और ओलावृष्टि ने गोरियामा पंचायत के सलेमापुर व टेंगराहा गांवों में भारी तबाही मचाई। सैकड़ों एकड़ में लगी गेहूं और मक्के की फसल पूरी तरह गिरकर बर्बाद हो गई। स्थानीय किसानों—मोतिलाल साह, रंजन गुप्ता, नारायण साही, धर्मेंद्र सिंह और संजीव कुमार उर्फ चुन्नू—ने बताया कि अचानक आई इस आसमानी आफत से उनकी महीनों की मेहनत पर पानी फिर गया। किसानों ने प्रशासन से मुआवजे की मांग की है।

बहु-फसली नुकसान से बढ़ी चिंता

साहेबगंज प्रखंड के गौड़ा गांव के किसान प्रयाग राय बताते हैं कि गेहूं की फसल तैयार हो चुकी है, जबकि तेलहन फसल तोरी और सरसों कटकर खेतों में रखी हुई है. दलहन में मूंग की बुआई भी चल रही है. ऐसे में असमय बारिश के कारण तीनों फसलों को भारी नुकसान हुआ है.

“तैयार फसल बर्बाद हो रही है और अगली फसल पर भी खतरा है—हम किसानों के वर्तमान के साथ भविष्य पर भी सवाल खड़ा हो गया है.”

उन्होंने कहा कि एक ओर तैयार फसल बर्बाद हो रही है, वहीं दूसरी ओर अगले मौसम की फसल भी प्रभावित हो रही है. बढ़ती महंगाई के कारण खेती की लागत पहले ही बहुत अधिक हो चुकी है, और अब मौसम की मार ने किसानों की हिम्मत को तोड़ दिया है. उनके अनुसार, किसानी अब घाटे का सौदा और मजबूरी बनती जा रही है.

बेमौसम बारिश से खेतों में गिरी गेहूं की फसल, किसानों की बढ़ी चिंता.

किसानों की जुबानी दर्द और बेबसी

हुस्सेपुर गांव के किसान राजू सहनी कहते हैं कि धान तो इस बार हुआ ही नहीं, और अब गेहूं भी नहीं होगा. हमने जो भी पैसा लगाया था, वह पूरी तरह बर्बाद हो जाएगा. जिस समय बारिश होनी चाहिए थी, उस समय नहीं हुई, और अब जब फसल तैयार है, तब लगातार बारिश हो रही है. ऐसे में हम फसल काटेंगे कैसे? पूरा खेत पानी में डूबा है, फसल बह जाएगी.

“मौसम की मार से सिर्फ फसल ही नहीं, किसानों का हौसला भी टूट रहा है.

किसानों को सरकारी अनुदान की जरूरत”

उनकी बातों में दर्द और बेबसी साफ झलकती है. एक ओर खेती में लगाया गया खर्च और दूसरी ओर मौसम की मार—दोनों मिलकर किसानों को आर्थिक संकट की ओर धकेल रहे हैं.

रिंकू देवी की चिंता

इसी गांव की महिला किसान रिंकू देवी भी बेहद चिंतित हैं. उनका कहना है कि अब तो फसल की पूरी तरह से बर्बादी समझिए. धान नहीं हुआ और अब गेहूं भी नहीं. हमारा सारा पैसा डूब गया. दिन-भर खेतों में मेहनत करते हैं, लेकिन जब फसल आने का समय आता है, तो वह भी बर्बाद हो जाती है. अब तो खेती करना ही बेकार लगने लगा है, इसमें कोई फायदा नहीं है.

“बारिश और ओलावृष्टि ने खेतों को नुकसान पहुंचाया, लेकिन सबसे ज्यादा असर किसानों की जिंदगी पर पड़ा है.”

रिंकू देवी की बात केवल उनकी अपनी नहीं, बल्कि गांव की कई महिलाओं और किसानों की साझा पीड़ा को दर्शाती है.

बिहार मौसम अलर्ट: IMD की चेतावनी

रेड अलर्ट वाले जिले

भारतीय मौसम विभाग (IMD) के अनुसार मुजफ्फरपुर, दरभंगा, पूर्णिया, वैशाली, पश्चिमी चंपारण और पटना सहित कई जिलों में ओलावृष्टि और तेज आंधी को लेकर रेड अलर्ट जारी किया गया है.

बारिश और तेज हवा के कारण खेत में गिरी हुई गेहूं की फसल, पानी से भरे खेत में खड़ा किसान

तेज हवा और वज्रपात

मौसम विभाग ने 40 से 60 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से तेज हवाएं चलने और वज्रपात की चेतावनी दी है, जिससे फसलों और जनजीवन पर खतरा बना हुआ है.

चेतावनी और सावधानियां

पटना प्रेस के अनुसार लोगों को सलाह दी गई है कि आंधी के दौरान पेड़ों या बिजली के खंभों के नीचे न रुकें और सुरक्षित स्थान या घर के अंदर ही रहें.

फसलों को भारी नुकसान

ओलावृष्टि और तेज हवा के कारण रबी की फसलें, जैसे गेहूं और मक्का, बड़े पैमाने पर प्रभावित हो रही हैं, जिससे किसानों को भारी आर्थिक नुकसान झेलना पड़ रहा है.

बढ़ता आर्थिक और मानसिक संकट

दिन-रात मेहनत करने के बाद भी यदि फसल सुरक्षित नहीं रह पाती, तो यह केवल आर्थिक नुकसान ही नहीं, बल्कि मानसिक रूप से भी किसानों को तोड़ देता है.

फसल की बर्बादी का सीधा मतलब है:

  • कर्ज का बढ़ना
  • परिवार की जरूरतों को पूरा करने में कठिनाई
  • आने वाले समय में और अधिक संघर्ष

सबसे बड़ी बात यह है कि यह समस्या केवल एक गांव तक सीमित नहीं है—आसपास के सभी गांवों में भी किसान इसी तरह की मार झेल रहे हैं.

बदलता मौसम और खेती पर असर

मौसम के इस असंतुलन ने यह स्पष्ट कर दिया है कि खेती अब पहले जैसी स्थिर और सुरक्षित नहीं रही.
समय पर बारिश न होना और अचानक अत्यधिक बारिश होना—दोनों ही किसानों के लिए नुकसानदायक साबित हो रहे हैं. ऐसे में किसानों को न सिर्फ आर्थिक मदद की जरूरत है, बल्कि ऐसी योजनाओं और सुविधाओं की भी आवश्यकता है, जो उन्हें प्राकृतिक आपदाओं से सुरक्षा प्रदान कर सकें.

समाधान की जरूरत

यह स्थिति केवल एक गांव की नहीं, बल्कि उन हजारों किसानों की है, जो हर साल उम्मीदों के साथ खेती करते हैं, लेकिन अंत में मौसम की मार झेलने को मजबूर हो जाते हैं. आज आवश्यकता है कि सरकार और समाज दोनों मिलकर किसानों की इस समस्या को गंभीरता से समझें और उनके लिए ठोस कदम उठाएं. क्योंकि यदि किसान सुरक्षित नहीं रहेगा, तो हमारी खाद्य व्यवस्था भी प्रभावित होगी.

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