✅देश भर में बढ़ रहीं जानवरों के साथ क्रूरता की घटनाएं
✅पहली बार एनसीआरबी में दर्ज हुए 9 हजार से अधिक मामले
✍️हेमलता म्हस्के

नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो ने देश में जानवरों के साथ क्रूरता से जुड़े मामलों को भारत में अपराध 2024 रिपोर्ट में पहली बार शामिल किया है. यह आंकड़ा पशु क्रूरता विरोधी अधिनियम के तहत दर्ज हुए मामलों पर आधारित है. नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो की रिपोर्ट के अनुसार, 2024 में देश भर में जानवरों के साथ क्रूरता के कुल 9,039 मामले दर्ज किए गए. इन मामलों में 10,312 लोगों को गिरफ्तार भी किया गया. इनमें 10,257 (99 फीसदी से अधिक) वयस्क पुरुष थे. पुलिस ने 96.7% मामलों में चार्जशीट भी दाखिल की. यानी हर दिन कई लोग जानवरों को मारने, जहर देने, घायल करने या उनके साथ क्रूरता करने के आरोप में पकड़े गए. गृह मंत्रालय की रिपोर्ट में बताया गया है कि इन मामलों में चार्जशीट दाखिल करने की दर 96.7 प्रतिशत रही, जो काफी ज्यादा मानी जा रही है. वहीं अदालतों में दोष साबित होने की दर 80.5 प्रतिशत दर्ज की गई. इसका मतलब है कि बड़ी संख्या में मामलों में कोर्ट ने आरोपियों को दोषी माना है. ब्लड प्रेशर कम करना है, तो पशुओं से प्यार करें.
82 फ़ीसदी मामले कोर्ट में लंबित
यह सुखद है कि देश में पहली बार जानवरों के खिलाफ होने वाले अपराधों का पूरा रिकॉर्ड सरकारी अपराध आंकड़ों में शामिल किया गया है. हालांकि पशुओं पर अत्याचार के मामले में लोगों में जागृति का घोर अभाव है. बहुत से मामले तो दर्ज ही नहीं हो पाते हैं. जो दर्ज हुए हैं उनमें अब भी बड़ी संख्या में केस अदालतों में लंबित हैं. रिपोर्ट के मुताबिक, करीब 82 प्रतिशत मामले अब भी कोर्ट में चल रहे हैं. वहीं 147 मामलों को सबूतों के अभाव में या कोई साक्ष्य नहीं मिलने के कारण बंद कर दिया गया. दो मामलों को कानूनी वजहों से एवं आरोपी की मौत की वजह से खत्म किया गया. क्राइम रिपोर्ट में साफ कहा गया है कि जानवरों को मारना, जहर देना या घायल करना अपराध है. ऐसे मामलों में केंद्रीय गृह मंत्रालय के तहत लागू पशु क्रूरता निवारण अधिनियम 1960 और भारतीय न्याय संहिता की धारा 325 के तहत कार्रवाई की जा सकती है. इसमें पांच साल तक की सजा का प्रावधान है. एनसीआरबी की रिपोर्ट में पशु चोरी के मामलों का भी उल्लेख किया गया है. साल 2024 में देश भर में पशु चोरी के 8,660 मामले दर्ज हुए थे. चोरी हुए पशुओं की कुल कीमत करीब 48.8 करोड़ रुपए बताई गई. इनमें से करीब 45 प्रतिशत मामलों में पशुओं को बरामद कर मालिकों को वापस सौंप दिया गया.
पशु क्रूरता के मामले में महाराष्ट्र अव्वल
पशु क्रूरता के मामले में पहले पायदान पर महाराष्ट्र है, जहां 2,927 मामले दर्ज किए गए. दूसरे स्थान पर तेलंगाना है, जहां 1,890 मामले दर्ज किये गए. केरल तीसरे स्थान पर है, जहां 1,510 मामले, उत्तर प्रदेश चौथे स्थान पर है, जहां 1,121 मामले, गुजरात में 526 और तमिलनाडु में 457 मामले दर्ज किए गए हैं. जम्मू-कश्मीर जैसे प्रदेश केंद्र शासित प्रदेशों में सबसे आगे है, जहां 223 मामले और दिल्ली में 35 मामले दर्ज किए गए. अरुणाचल प्रदेश, मिजोरम, नागालैंड, सिक्किम और त्रिपुरा जैसे पूर्वोत्तर राज्यों में पशु क्रूरता विरोधी कानूनों के तहत कोई भी मामला दर्ज नहीं किया गया. जानवरों के अधिकारों के लिए काम करने वाले संगठनों का मानना है कि इन आधिकारिक आंकड़ों का आना जानवरों के प्रति हिंसा को रोकने की दिशा में एक बड़ा कदम है, क्योंकि इस प्रकार की क्रूरता अक्सर मनुष्यों के खिलाफ होने वाले हिंसक अपराधों से जुड़ी होती है.
मालिक से प्यार करने वाले कुत्ते-बिल्लियां
जानकारों का कहना है कि जानवरों के खिलाफ हिंसा और इंसानों के खिलाफ अपराधों के बीच गहरा संबंध होता है. उनका मानना है कि अब राष्ट्रीय स्तर पर डेटा उपलब्ध होने से ऐसे अपराधों को रोकने की रणनीति और मजबूत बनाई जा सकेगी. यह सच्चाई है कि इंसान और जानवरों का रिश्ता हजारों साल पुराना, गहरा और निस्वार्थ होता है. यह सिर्फ जरूरतों पर आधारित नहीं है, बल्कि विश्वास, बिना शर्त प्यार और भावनात्मक जुड़ाव का एक अनूठा उदाहरण है. पालतू जानवर (जैसे कुत्ते और बिल्ली) बिना किसी स्वार्थ और आलोचना के अपने मालिक से प्यार करते हैं. शोध बताते हैं कि जानवरों के साथ समय बिताने से इंसानों के रक्तचाप में कमी आती है, तनाव कम होता है और ‘ऑक्सीटोसिन’ नामक हार्मोन बढ़ता है, जो मानसिक शांति देता है. इतिहास से लेकर आज तक कुत्तों और अन्य जानवरों ने इंसानों के पहरेदार, शिकारी साथी और मार्गदर्शक के रूप में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है. कई ऐसी सच्ची घटनाएं सामने आती हैं जहां जानवर अपनी जान जोखिम में डालकर इंसानों (खासकर बच्चों) की रक्षा करते हैं.
बहरहाल, आज के समय में कुत्तों, घोड़ों और अन्य जानवरों का इस्तेमाल विशेष रूप से बुजुर्गों, अवसाद से ग्रसित लोगों और विशेष बच्चों की काउंसलिंग और थेरेपी के लिए भी किया जाने लगा है. अकेले रहने वाले लोगों या बुजुर्गों के लिए जानवर एक परिवार के सदस्य बनकर उनका अकेलापन दूर करते हैं. जानवरों के साथ रहने से इंसानों के भीतर सहानुभूति और संवेदनशीलता का विकास होता है. कानून बने होने के बावजूद जानवरों पर अत्याचार बढ़े ही हैं, कम नहीं हो रहे हैं. लोगों को जागरूक करने के लिए कई गैर-सरकारी संस्थाएं भी सक्रिय हैं, लेकिन इनकी संख्या बहुत कम है.






