
✍️ दीपमाला भारती
पिता : श्री रमेश कुशवाहा (किसान)
माता : श्रीमती मुन्नी देवी (गृहिणी)
पेशा : अध्ययन
पारिवारिक पृष्ठभूमि : मैं एक मध्यमवर्गीय परिवार से संबंध रखती हूँ। मेरे परिवार में दो बहनें और दो भाई हैं तथा हम सभी वर्तमान में शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं।
रुचियाँ एवं साहित्यिक परिचय : मुझे बचपन से ही साहित्य पढ़ने में विशेष रुचि रही है। कविता, कहानी, उपन्यास तथा विभिन्न प्रकार की साहित्यिक रचनाएँ पढ़ना मुझे पसंद है। पुस्तकों के माध्यम से नई सोच और भावनाओं को समझना मेरे लिए प्रेरणादायक रहा है।
कविता लेखन की शुरुआत : मेरी कविता लेखन यात्रा कक्षा 6 से शुरू हुई। कविताएँ पढ़ते-पढ़ते मेरे भीतर लेखन की प्रेरणा जागी। मुझे लगता था कि मैं भी अपने विचारों और भावनाओं को शब्दों में व्यक्त कर सकती हूँ। शुरुआत में मैंने छोटी-छोटी कविताएँ लिखनी शुरू कीं और धीरे-धीरे लेखन के प्रति मेरा लगाव बढ़ता गया। अब तक मैं अनेक कविताएँ लिख चुकी हूँ तथा कहानी और उपन्यास लेखन का भी प्रयास करती हूँ।
भविष्य का लक्ष्य : मेरा उद्देश्य एक अच्छी लेखिका और कवयित्री के रूप में अपनी पहचान बनाना है। जैसे आज मैं अनेक लेखकों और कवियों की रचनाएँ पढ़ती हूँ, उसी प्रकार भविष्य में मैं चाहती हूँ कि पाठक मेरी रचनाओं को भी पढ़ें और उनसे जुड़ाव महसूस करें।
टूटते हुए सपने
टूटते हुए सपने, बिखरते हुए विचार
एक अनजानी दिशा में भटकते कदम बार-बार
न रुकती यह गति, न थमती यह राह
एक अनिश्चित भविष्य की ओर बढ़ती हर चाह
भीड़ भरी इस दुनिया में खोए हुए हम
अपने ही चेहरे से अनजान हुए हम
सोशल मीडिया की चमक में ऐसे उलझे
कि अपने सपनों से ही धीरे-धीरे दूर निकले
हमने अरमानों का सौदा कर डाला
दूसरों की चाहतों को अपना सपना बना डाला
जो कभी अपने थे, वे रास्ते छूट गए
और हम भीड़ के पीछे कहीं टूट गए
प्रदूषण की मार, शोर का अंधा विस्तार
मन और शरीर पर बढ़ता अदृश्य भार
अपनी जड़ों से दूर, अपनी पहचान से परे
हम संस्कृति की छाँव छोड़, भटक रहे अँधेरे में खड़े
टूटते हुए सपने, बिखरते हुए विचार
फिर भी चल रहे हैं कदम लिए एक मौन पुकार
शायद किसी मोड़ पर फिर खुद को पा जाएँ,
और अपने खोए सपनों को फिर से सजा जाएँ.
मेरी इच्छा
काश ! मैं पंछी होती
तो तुम जहाँ भी होते
मैं पंख फैलाकर
ऊड़कर वहीं चली आती
तुम्हें देखने के लिए
ये आंखे तो ना तरसते
काश मैं पंछी होती तो
ना रिश्ते की मर्यादा की मुझे चिंता होती
ना तुम से दूर रहने की मजबूरी होती
ना समय की सख़्ती होती
ना तुम्हे खोने का डर होता
ना तुम्हारे मन में
मेरे लिए संदेह होता
ना यह दुनिया
मेरी नज़र पर सवाल उठाती
मैं बस उड़कर आती
तुम्हारे पास
किसी पेड़ की डाली पर बैठ जाती
कुछ गुनगुनाती
तुम्हें मीठी राग सुनाती
तुम्हें देखकर मुस्कुराती
ना मुझे तुम्हारे मान-प्रतिष्ठा पर
दग़ा की चिंता होती
काश मैं पंछी होती तो
ना विरह इतना गहरा होता
ना आँखें हर रात
तुम्हारी याद में रोती
अगर तुम मुझे
पिंजरे में भी क़ैद करते
तो मैं खुशी खुशी रहतीं
काश मैं पंछी होती तो
यह प्रेम इतना बेबस न होता
पिंजरे में बंद होती
पर दिल से आज़ाद होती.
✨नवोदित कवयित्री द्वारा अब तक दर्जनों कविताएँ एवं अन्य साहित्यिक रचनाएँ लिखी जा चुकी हैं। प्रस्तुत हैं दो चयनित कविताएँ, जो भावनाओं, संवेदनाओं और जीवन के विविध अनुभवों को अभिव्यक्त करती हैं। आशा है कि ये कविताएँ सभी पाठकों को पसंद आएँगी तथा उनके मन को स्पर्श करने में सफल होंगी।








