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आंखों की बीमारी से जूझता एक टोला

विकसित भारत के दावों के बीच ग्रामीण इलाकों की सच्चाई अब भी गरीबी, बेरोजगारी, बीमारी और पलायन की गंभीर चुनौतियों से घिरी हुई है। बिहार के मुजफ्फरपुर जिले के मड़वन प्रखंड स्थित भटौना गांव के सहनी टोला की तस्वीर इस हकीकत को सामने लाती है। 150 से अधिक परिवारों वाली इस बस्ती में अधिकांश लोग झोपड़ियों में रहने को मजबूर हैं और आजीविका के लिए दूसरे राज्यों में मजदूरी करने जाते हैं। स्वास्थ्य सुविधाओं और आर्थिक संसाधनों के अभाव में गंभीर बीमारियों का इलाज भी उनके लिए असंभव हो जाता है।

मुजफ्फरपुर के भटौना गांव के सहनी टोला में आंखों की बीमारी से जूझ रहे परिवार, जहां कई बच्चे दृष्टिबाधिता और नेत्र संबंधी समस्याओं से प्रभावित हैं।
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👉गरीबी, पलायन एवं बेरोजगारी है इस बस्ती की बदनीयती

👉झोपड़ियों में लोग रहने को हैं विवश

👉स्वास्थ्य विभाग की कब पड़ेगी नजर

यशोदा कुमारी पासवान की रिपोर्ट

भले सरकारें विकसित भारत और विकसित राज्य के सपने दिखा रही हों, लेकिन हकीकत यह है कि यह सिर्फ सपना ही है, सच्चाई कुछ और है. जब आप शहर की चकाचौंध से निकलकर सुदूर देहातों में जायेंगे, तब पता चलेगा कि आज भी भारत के गांव कितनी गरीबी, बेकारी, बीमारी और पलायन की समस्या से जूझ रहे हैं. पूरी की पूरी बस्ती झोपड़ियों में रातें गुजारने को विवश हैं. बिहार के सैंकड़ों दलित-महादलित बस्तियों के बच्चों को पोषणयुक्त भरपेट भोजन नहीं मिल पाता है. वे कुपोषण व बीमारी से भी ग्रसित हैं, लेकिन यह सब सरकारी आंकड़ों में दर्ज नहीं हैं.

ऑपरेशन कराने के लिए नहीं हैं पैसे

आइए, आपको एक ऐसी ही बस्ती की तस्वीर दिखाते हैं. बिहार के मुजफ्फरपुर शहर से करीब 12-13 किलोमीटर पश्चिम एक गांव है भटौना. मड़वन प्रखंड के इस गांव में एक बस्ती है ‘सहनी टोला’. 150 से अधिक परिवार वाले इस टोले में चारों तरफ झोपड़ियां ही झोपड़ियां दिखती हैं. काफी संख्या में लोग गुजरात, महाराष्ट्र, पंजाब, दिल्ली जाकर मजदूरी कर अपने परिवार का भरण-पोषण करते हैं. टोले में गरीबी का आलम है. कोई गंभीर बीमारी हो जाए, तो इलाज कराने के भी उनके पास पैसे नहीं होते हैं. इस टोले की चिंता देवी चार बेटियों की मां है. दो जवान बेटियों सुमन और गुड़िया की आंखों में बचपन से भी दृष्टिहीनता की समस्या है. यह पूछने पर कि क्या इसका इलाज आपने नहीं कराया है, चिंता देवी बताती हैं – हम गरीब हैं. मेरे पति लालबाबू सहनी मजदूरी करते हैं. उतने पैसे नहीं हैं कि कहीं बाहर ले जाकर दोनों बेटियों का ऑपरेशन करवाएं.

एक घर में चार लोगों की आंखें हैं ख़राब

यह पूरा टोला दृष्टिहीनता की बीमारी से पूरी तरह जकड़ा है. यहां के छोटे-छोटे बच्चों समेत करीब 20 लोग आंख की बीमारी से पीड़ित हैं. चार बच्चों की मां विभा देवी ने बताया कि मेरी एक बेटी का दाहिना आंख ख़राब है. जब वह चार माह की थी, तभी उसकी आंख से रोशनी गायब होने लगी. जब वह 7 साल की हुई, तब मुजफ्फरपुर आई हॉस्पिटल के गए. डॉक्टर ने बताया कि 12-13 साल बाद इसका ऑपरेशन कराना होगा. विभा देवी के घर में तीन लोग दृष्टिहीनता की समस्या से ग्रसित हैं.

एक देवर एवं एक गोतनी की एक-एक आंख में प्रॉब्लम है. दिल्ली पलायन कर मजदूरी करने वाले इंदल सहनी की पत्नी गुड़िया देवी कहती हैं कि मेरे दो बच्चे हैं, जिनमें एक बेटा, जिसका नाम शिवम है को एक आंख से नहीं दिखता है. 60 वर्षीय रघुनाथ सहनी के 5 पोता-पोतियों में एक पोता (4 वर्ष) एवं एक पोती (9 वर्ष) की एक-एक आंख की रोशनी ख़त्म हो गयी है. रघुनाथ ने बताया कि इसके पिता दैनिक मजदूर हैं. डॉक्टर बोला है पटना में इलाज कराने के लिये. मेरे बेटे की कमाई इतनी नहीं है कि पटना ले जाए. मैं अब कमाता नहीं हूं. हम गरीब हैं. झोंपड़ी में रहते हैं.

यह आश्चर्य से अधिक शोध का विषय है कि एक ही टोला में एक तरह की बीमारी से आखिर इतने लोग ग्रसित क्यों हैं? इसका कारण क्या है? नेत्र विशेषज्ञ भी इसका स्पष्ट कारण नहीं बता पा रहे हैं. उधर, यह गांव स्वास्थ्य विभाग, सदर अस्पताल या नेत्र चिकित्सालय के संज्ञान से अब तक बाहर है। जबकि मुजफ्फरपुर में कम-से-कम दो बड़े नेत्र चिकित्सालयों के अलावा मेडिकल कॉलेज भी हैं. इस संबंध में सदर अस्पताल के सिविल सर्जन को संपर्क करने की कोशिश की गई, लेकिन उन्होंने काॅल नहीं उठाया.

क्या कहती हैं नेत्र रोग विशेषज्ञ

अखंड ज्योति अस्पताल की नेत्र रोग विशेषज्ञ डॉ सोनी कुमारी कहती हैं कि इस तरह की समस्या वंशानुगत होती है. गर्भावस्था के दौरान यदि महिला कोई गलत दवा खा लेती है, तब भी बच्चे की आंखों में समस्या पैदा हो जाती है. ऐसी स्थिति में जन्म के पांच साल के भीतर उसका इलाज कराना जरूरी होता है. छोटा बच्चा को एक आंख से नहीं दिखता रहता है, लेकिन माता-पिता को पता नहीं चलता है कि उसे नहीं दिख रहा है. कुछ बच्चों की पुतली थोड़ी तिरछी हो जाती है, जिसे भींगापन कहते हैं. इसमें दाएं या बाएं में से कोई एक मसल्स एक तरफ खींचा रहता है, तो भी ऐसा प्रॉब्लम होता है.

इसका ऑपरेशन करना पड़ता है. कभी-कभी एक्सरसाइज से भी ठीक हो जाता है. यह संक्रमण से भी होता है. वहां की महिलाएं कोई ऐसी चीज खाती होंगी, जिसका असर भी हो सकता है. या फिर किसी चीज का इन्फेक्शन हो सकता है. कभी-कभी चेचक के दौरान आंख में फलक होने और फिर उसके फुटने से भी समस्या आती है. पीला वाला भौंडा के काटने से भी आंखों में पत्थर जैसा हो जाता है. कई कारण हो सकते हैं. यदि मशीन से जांच हो तो पता चलेगा कि आंखों में जेल की कमी है या वाटर की कमी है? स्थानीय स्तर पर कुछ तो ऐसी चीज है, जिसकी वजह से एक ही टोले में आंखों की बीमारी के इतने मरीज हैं. अभी कुछ दिन पहले एक संस्था ने इस टोले में जांच कैंप लगाया था, जिसमें मैं भी शामिल थीं.

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