◆ कभी किसी की झोंपड़ी में तो, कभी सड़क किनारे बिताते हैं रातें
◆ बुढ़ापे में मजदूरी कर पेट पालने की है मजबूरी
◆ कानूनी अपराध है बाप-मां को बेघर करना, बेटों को हो सकती है जेल
◆ पत्नी ने भी दांपत्य धर्म को किया है तार-तार
✍️काजल कुमारी, चांदकेवारी

पारू, मुजफ्फरपुर। उम्र करीब 60 साल. शरीर पर मेहनत की थकान, चेहरे पर बेबसी और आंखों में अपनों के लौट आने की उम्मीद. यह कहानी है पारू प्रखंड के चांदकेवारी गांव निवासी भूलन महतो की. कभी जिस घर को उन्होंने अपना सहारा समझा होगा, आज उसी घर से वे दूर हैं. रहने के लिए कोई स्थायी ठिकाना नहीं है और पेट भरने के लिए दूसरों के खेतों में मजदूरी ही उनका सहारा बन गई है.
भूलन महतो के परिवार में उनकी पत्नी परबतिया देवी, दो बेटे और एक बेटी हैं. ग्रामीणों के अनुसार, भूलन महतो को नशे की आदत है और उनकी मानसिक स्थिति भी पूरी तरह ठीक नहीं रहती. इसी वजह से परिवार के साथ उनका रिश्ता धीरे-धीरे बिगड़ता चला गया. स्थिति यहां तक पहुंच गई कि उनके दोनों बेटों ने उन्हें घर से अलग कर दिया. पत्नी से भी उन्हें वह सहारा नहीं मिल पा रहा है, जिसकी जरूरत इस उम्र में सबसे अधिक होती है. सनद रहे कि छोटा बेटा ऑटो चलाता है और बड़ा मजदूरी करता है.
खेतों में मजदूरी करता है, फिर भी दो वक्त की रोटी मयस्सर नहीं
आज भूलन महतो के पास अपना कोई ठिकाना नहीं है. कभी किसी के खेत में बनी छोटी-सी झोपड़ी में रात गुजारते हैं, तो कभी सड़क किनारे ही सो जाते हैं. दिन निकलते ही वे मजदूरी की तलाश में निकल पड़ते हैं. दिनभर खेत में काम करने के बाद उन्हें करीब 60 रुपये मिलते हैं. इसी छोटी-सी मजदूरी से वे अपने खाने का इंतजाम करते हैं. जिस दिन काम नहीं मिलता, उस दिन उनके सामने भोजन की चिंता और गहरी हो जाती है.
भूलन महतो की जिंदगी का सबसे बड़ा सवाल सिर्फ गरीबी नहीं, बल्कि अपनों से दूरी भी है. उनके अनुसार, उनके दोनों बेटों के पास रहने के लिए पक्का मकान है. घर में परिवार के दूसरे सदस्यों के लिए खाने और पहनने की व्यवस्था है, लेकिन उनके लिए उसी घर में जगह नहीं बची. वह व्यक्ति जिसने कभी अपने बच्चों के लिए परिवार का हिस्सा बनकर जीवन बिताया, आज अपने ही गांव में आश्रय की तलाश में भटक रहा है.
भूलन महतो की पत्नी परबतिया देवी धार्मिक आस्था रखती हैं और भगवान की पूजा-भक्ति करती हैं. लेकिन पति की मौजूदा स्थिति में उनकी भूमिका और देखभाल को लेकर सवाल खड़े होते हैं. यह स्थिति एक बड़े सामाजिक सवाल की ओर भी इशारा करती है. क्या किसी व्यक्ति की नशे की आदत या मानसिक परेशानी उसे परिवार और समाज से पूरी तरह अलग कर देने का आधार बन सकती है? क्या बुजुर्ग और कमजोर व्यक्ति को उसके हाल पर छोड़ देना ही परिवार की जिम्मेदारी से मुक्ति है?
संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष और विभिन्न रिपोर्ट्स के मुताबिक, भारत में 1.5 करोड़ से अधिक बुजुर्ग पूरी तरह अकेले या बिना किसी पारिवारिक सहारे के जीवन जीने को मजबूर हैं. हेल्पेज इंडिया और अन्य संगठनों के सर्वेक्षण के अनुसार, भारत में करीब 47 से 65 फीसदी बुजुर्ग अपने ही परिवार में किसी न किसी रूप में दुर्व्यवहार, अनादर या उपेक्षा का शिकार होते हैं.
भारत सरकार के माता-पिता और वरिष्ठ नागरिक भरण-पोषण तथा कल्याण अधिनियम, 2007 के तहत बच्चों या रिश्तेदारों द्वारा बुजुर्ग माता-पिता को बेसहारा छोड़ना या घर से निकालना कानूनी अपराध है. इसके तहत बुजुर्ग अपने बच्चों से भरण-पोषण का खर्च पाने के लिए कानूनी मदद ले सकते हैं
भूलन महतो की कहानी सिर्फ एक परिवार की कहानी नहीं है. यह उन बुजुर्ग और कमजोर लोगों की स्थिति को भी सामने लाती है, जिनके पास न नियमित आय है, न रहने की सुरक्षित जगह और न ही संकट के समय साथ खड़ा होने वाला कोई व्यक्ति. उम्र बढ़ने के साथ जब उन्हें सहारे की जरूरत है, तब वे खेतों में मजदूरी करके अपने लिए दो वक्त के भोजन का इंतजाम कर रहे हैं.
दिनभर खेत में पसीना बहाने के बाद जब भूलन महतो शाम को लौटते हैं, तो उनके सामने सबसे बड़ा सवाल यही होता है कि आज रात कहां सोना है. किसी खेत की छोटी-सी झोपड़ी, सड़क का किनारा या किसी परिचित की जगह. उनके पास घर की यादें हैं, लेकिन घर नहीं.
भूलन महतो की जिंदगी यह सवाल छोड़ जाती है कि जिस समाज में परिवार को सबसे बड़ा सहारा माना जाता है, वहां किसी व्यक्ति के अपने ही लोग उसे इस तरह अकेला छोड़ दें तो उसकी जिम्मेदारी आखिर किसकी है? क्या गांव, समाज और स्थानीय प्रशासन मिलकर ऐसे बेसहारा लोगों के लिए सुरक्षित आश्रय और भोजन की व्यवस्था नहीं कर सकते?
सड़क किनारे कटती हैं रातें, ग्रामीणों व प्रतिनिधियों की मदद की दरकार
भूलन महतो आज भी काम कर रहे हैं. 60 वर्ष की उम्र में शरीर साथ दे या न दे, पेट की भूख उन्हें हर सुबह खेत तक ले जाती है. उनके पास न स्थायी घर है, न निश्चित आमदनी और न भविष्य की कोई सुरक्षा. फिर भी अगली सुबह काम मिलने की उम्मीद में वे रात गुजारते हैं.यह कहानी सिर्फ भूलन महतो की बेबसी नहीं, बल्कि उस सवाल की कहानी है जो उनके साथ सड़क किनारे सोता है और सुबह उनके साथ खेत तक जाता है – क्या अपनों से छूट चुका एक इंसान समाज के लिए भी बेसहारा हो जाता है?









