👉वाद्य यंत्र हैं, संगीत शिक्षक का इंतजार
✍️रिमझिम कुमारी, चांदकेवारी

पारू, मुजफ्फरपुर। स्कूल में कार्यक्रम चल रहा है। सामने बच्चों की भीड़ है। कोई मंच पर भाषण देने की तैयारी कर रहा है, कोई गाना गाने के लिए अपनी बारी का इंतजार कर रहा है, तो कोई नाटक और डांस में हिस्सा लेने के लिए तैयार खड़ा है। कुछ साल पहले तक सरकारी स्कूलों में इस तरह का माहौल नहीं था। अब कई सरकारी स्कूलों में धीरे-धीरे तस्वीर बदलती दिखाई दे रही है। मंच तक पहुंच रहे बच्चे
पहले सरकारी स्कूल का नाम सुनते ही गांव में लोगों की बातचीत अक्सर पढ़ाई, शिक्षक और किताब-कॉपी तक ही सीमित रहती थी। बच्चों के लिए पढ़ाई के अलावा दूसरी गतिविधियों को उतनी प्राथमिकता नहीं मिलती थी। कई बच्चे स्कूल तो आते थे, लेकिन अपनी प्रतिभा दिखाने के लिए उन्हें मंच नहीं मिल पाता था।
स्कूल बदल रहा है
स्वतंत्रता दिवस, गणतंत्रता दिवस, शिक्षक दिवस और अन्य अवसरों पर कार्यक्रमों की धूम रहती है। बच्चे इनमें डांस, संगीत, भाषण, नाटक, खेलकूद और अन्य गतिविधियों में हिस्सा ले रहे हैं। चेतना सत्र से लेकर मंच पर आने का मौका मिलने से बच्चों की झिझक भी धीरे-धीरे कम हो रही है। जो बच्चे पहले माइक पकड़ने से डरते थे, अब मंच पर बोल रहे हैं।
शिक्षक बोले—पहले से ज्यादा जागरूक हुए बच्चे
उत्क्रमित मध्य विद्यालय डुमरी परमानंदपुर के शिक्षक सुरेंद्र कुमार बताते हैं कि पहले की तुलना में बच्चों और अभिभावकों में स्कूल और पढ़ाई को लेकर ज्यादा जागरूकता आई है। बच्चे अब नियमित रूप से स्कूल आने की कोशिश कर रहे हैं और स्कूल में होने वाली गतिविधियों में भी बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रहे हैं।
बच्चों को केवल किताबों तक सीमित रखने के बजाय जब उन्हें अपनी पसंद की गतिविधियों में हिस्सा लेने का अवसर मिलता है, तो उनके अंदर आत्मविश्वास भी आता है। धीरे-धीरे बच्चे अपनी बात सामने रखना सीख रहे हैं। गांव के बच्चों में प्रतिभा की कमी नहीं है। जरूरत सिर्फ इतनी है कि उन्हें समय-समय पर अपना कौशल दिखाने का अवसर मिले।
अभिभावक भी समझ रहे हैं कि सिर्फ किताब ही काफी नहीं
स्कूल में बदलाव के साथ अभिभावकों की सोच में भी बदलाव दिखाई दे रहा है। पारू के अभिभावक सुनील दास बताते हैं कि पहले गांव के लोग बच्चों की पढ़ाई और स्कूल को लेकर उतने जागरूक नहीं थे। वे कहते हैं, “पहले हम लोग पढ़ाई और स्कूल को लेकर उतना जागरूक नहीं थे। अब हम लोगों को भी समझ आया कि बच्चों को पढ़ना और पढ़ाई के साथ कुछ-कुछ गतिविधियों में भाग लेना भी जरूरी है। इसलिए अब बच्चे स्कूल भी जाते हैं और अलग-अलग प्रकार की गतिविधियों में भाग भी लेते हैं।”
सुनील दास की बात सिर्फ एक अभिभावक की सोच में आए बदलाव को नहीं बताती, बल्कि यह भी दिखाती है कि स्कूल और परिवार के बीच जुड़ाव बढ़ने लगा है।
बच्चियों ने कहा—अब स्कूल आने में डर नहीं लगता
पारू प्रखंड के सरकारी स्कूल में पढ़ने वाली छात्राएं आयुषी कुमारी, विमला, रौशनी और सृष्टि बताती हैं कि पहले स्कूल जाने को लेकर डर और झिझक रहती थी। पढ़ाई के अलावा गतिविधियां भी कम होती थीं। अब स्कूल में खेलकूद और दूसरी गतिविधियां होती हैं, जिसमें उन्हें हिस्सा लेने का मौका मिलता है।
छात्राओं का कहना है, “पहले हम लोग स्कूल जाने से डरते थे। पहले पढ़ाई भी इतनी नहीं होती थी, लेकिन अब पढ़ाई के साथ-साथ खेलकूद और गतिविधियां भी होती रहती हैं। इससे हम लोगों को मौका मिलता है और बहुत कुछ सीखने को मिलता है।”
इन बच्चियों के लिए स्कूल में होने वाली गतिविधियां सिर्फ मनोरंजन का साधन नहीं हैं। यही गतिविधियां उन्हें लोगों के सामने बोलने, साथियों के साथ काम करने और अपनी बात रखने का अवसर दे रही हैं।
गांव में प्रतिभा बहुत है, बस मंच की जरूरत है
पारू प्रखंड के ग्रामीण इलाकों में रहने वाले बच्चों की जिंदगी शहर के बच्चों से कई मायनों में अलग है। कई बच्चों के परिवारों के पास अतिरिक्त संसाधन नहीं हैं। किसी बच्चे को डांस पसंद है, कोई अच्छा गाता है, कोई खेल में बेहतर है तो कोई कहानी या भाषण सुनाने में आगे है। लेकिन हर बच्चे को अपनी प्रतिभा दिखाने के लिए अलग से मंच मिलना आसान नहीं है।
ऐसे में सरकारी स्कूलों में होने वाले कार्यक्रम बच्चों के लिए महत्वपूर्ण बन जाते हैं। स्कूल उनके गांव के नजदीक है और यहीं उन्हें अपनी प्रतिभा दिखाने का अवसर मिल सकता है। पढ़ाई के साथ खेलकूद, सांस्कृतिक कार्यक्रम और रचनात्मक गतिविधियां बच्चों के सीखने के अनुभव को अलग रूप देती हैं। जरूरत इस बात की है कि ऐसे कार्यक्रम सिर्फ खास दिनों तक सीमित न रहें, बल्कि बच्चों को पूरे साल अपनी प्रतिभा दिखाने के अवसर मिलते रहें। गांव के इन बच्चों में भी सपने हैं, हुनर है और आगे बढ़ने की इच्छा है।
🎵 मंच मिला, हुनर दिखा—अब सुरों को शिक्षक का इंतजार
स्थानीय लोगों ने बताया कि बिहार के सरकारी विद्यालयों में बच्चों को संगीत सीखने के लिए हारमोनियम, कैसियो, झाँझ-करताल, ढोलक और म्यूजिक सिस्टम जैसे वाद्य यंत्र उपलब्ध कराए गए हैं। लेकिन विडंबना यह है कि इन वाद्य यंत्रों को बजाने और बच्चों को सिखाने के लिए संगीत शिक्षक ही नहीं हैं। परिणामस्वरूप कई विद्यालयों में ये उपकरण धूल और जंग खा रहे हैं और खामोश पड़े हैं। जबकि बच्चे सुर, लय, ताल और ‘सरगम’ सीखने के लिए उत्सुक हैं। यदि वाद्य यंत्र उपलब्ध कराने के साथ ही संगीत शिक्षकों की व्यवस्था भी की जाए, तो मंच पर अपनी प्रतिभा दिखाने वाले ये बच्चे संगीत के माध्यम से अपनी कलात्मक क्षमता, रचनात्मक कौशल और आत्मविश्वास को और बेहतर ढंग से विकसित कर सकेंगे।











