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महंगाई का असर, जलावन के लिए काटे जा रहे हैं पेड़

मुजफ्फरपुर के हुस्सेपुर परनी छपरा गांव में 2020 की बाढ़ के बाद पेड़ों की संख्या काफी कम हो गई है। बचे हुए पेड़ों को भी कई ग्रामीण जलावन के लिए काटने को मजबूर हैं। ग्रामीणों के अनुसार, गैस की बढ़ती कीमत, समय पर सिलेंडर नहीं मिलना और बुकिंग की परेशानियों के कारण लकड़ी पर निर्भरता बढ़ी है। इसका असर गांव की हरियाली और पर्यावरण पर पड़ने की चिंता ग्रामीणों में है। महिलाओं का कहना है कि महंगाई ने घरेलू खर्च और स्वास्थ्य संबंधी जरूरतों को भी प्रभावित किया है। गांव में पेड़ बचाने और नए पौधे लगाने के साथ सुलभ

महंगाई का असर, जलावन के लिए काटे जा रहे हैं पेड़
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  • हुस्सेपुर परनी छपरा में पर्यावरण को लेकर चिंता
  • महंगाई इतनी कि सिलिंडर भरवाने के लिए नहीं हैं पैसे
  • गरीबी के कारण पति का ईलाज नहीं करवा पा रही है कामिनी देवी

© सपना कुमारी की कलम से

साहेबगंज (मुजफ्फरपुर)। हम बात कर रहे हैं गांव हुस्सेपुर परनी छपरा, थाना साहेबगंज, जिला मुजफ्फरपुर की. यह गांव कभी पेड़-पौधों से हरा-भरा था. लेकिन 2020 में आई बाढ़ के कारण कई पेड़ गिर गए थे. इसके बाद गांव में पेड़-पौधों की संख्या पहले की तुलना में कम हो गई है. अब बचे हुए पेड़ों में से भी कुछ पेड़ जलावन के लिए काटे जा रहे हैं.

हमने कई लोगों से पूछा कि वे पेड़-पौधों को क्यों काट रहे हैं, तो लोगों ने बताया कि गैस की बढ़ती कीमत और समय पर गैस नहीं मिलने की परेशानी के कारण उन्हें खाना बनाने के लिए जलावन की जरूरत पड़ती है. इसी मजबूरी में वे आसपास के पेड़ों और लकड़ियों का इस्तेमाल कर रहे हैं.

30 वर्षीया प्रियंका देवी बताती हैं कि पहले जब हम रसोई गैस बुक करते थे, तो हमें समय पर सिलेंडर मिल जाता था और दाम भी कम था. लेकिन अब ऑनलाइन बुकिंग करने के बाद भी समय पर सिलेंडर नहीं मिल पा रहा है और दाम भी बहुत अधिक हो गया है. पहले गैस घर-घर पहुंचाया जाता था, लेकिन अब एजेंसी तक काफी दूर जाना पड़ रहा है. साहेबगंज और अहियापुर की एजेंसी से जुड़ी इस दुरूह व्यवस्था के कारण भी उन्हें परेशानी होती है. नंबर पर ओटीपी आने के कारण भी दिक्कत होती है. उनका कहना है कि हम लोग ज्यादा पढ़े-लिखे नहीं हैं, इसलिए इन सब चीजों को समझने में परेशानी होती है. जलावन की समस्या होने के कारण आसपास के पेड़ों को काटना पड़ता है.

पूनम देवी, उम्र 26 वर्ष, का भी कहना है कि पहले गैस समय पर मिल जाता था, लेकिन अब काफी परेशानी हो रही है. उनका कहना है कि जिन परिवारों में सदस्य अधिक हैं, उन्हें कई दिनों के बाद, कभी-कभी लगभग 45 दिनों के अंतराल पर सिलेंडर मिल रहा है. ऐसे परिवारों में खाना बनाने के लिए जलावन की जरूरत बढ़ जाती है और इसके लिए आसपास की लकड़ी का इस्तेमाल करना पड़ता है.

गांव में पेड़ों की संख्या कम होने और उसकी कटाई किए जाने पर लोगों में पर्यावरण को लेकर भी चिंता है. पेड़-पौधे पर्यावरण के लिए महत्वपूर्ण माने जाते हैं. पेड़ों की संख्या कम होने से स्थानीय हरियाली और पर्यावरण पर असर पड़ सकता है. पेड़-पौधे वातावरण से कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित करने और ऑक्सीजन उपलब्ध कराने की प्राकृतिक प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. इसलिए गांव में पेड़ों की लगातार कमी पर्यावरण के लिहाज से चिंता का विषय हो सकता है.

ग्रामीणों का कहना है कि आसपास हरियाली कम होने से गर्मी का एहसास भी बढ़ता हुआ लगता है. हालांकि गांव में तापमान बढ़ने, वर्षा के समय में बदलाव या लोगों में होने वाली बीमारियों का सीधा कारण केवल पेड़ों की कटाई को मानना उचित नहीं होगा. इन पर मौसम, जलवायु, प्रदूषण, स्वास्थ्य सुविधाओं और अन्य कई कारकों का भी प्रभाव पड़ सकता है. फिर भी ग्रामीणों का मानना है कि पेड़-पौधों की संख्या बढ़ाना गांव के वातावरण को बेहतर बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम हो सकता है.

बढ़ती महंगाई को लेकर 28 वर्षीया कामिनी देवी (जिनके दो बच्चे हैं, एक लड़का और एक लड़की) बताती हैं कि बढ़ती महंगाई के कारण वह अपने पति का इलाज भी ठीक से नहीं कर पा रही हैं. उनके पति की तबीयत अक्सर खराब रहती है. पैसों की कमी के कारण वह फिलहाल अस्थायी रूप से दवाई करा रही है. उनका कहना है कि उनके पास इतने पैसे नहीं हैं कि वह मुजफ्फरपुर जाकर अपने पति का इलाज करा सकें.

कामिनी देवी का कहना है कि महंगाई को नियंत्रित करने के लिए सरकार को कुछ ठोस कदम उठाने चाहिए, ताकि गरीब और कम आय वाले परिवारों पर इसका बोझ कम हो सके.

गांव की स्थिति देखकर यह प्रतीत होता है कि महंगाई, ईंधन की उपलब्धता और पर्यावरण की समस्या एक-दूसरे से जुड़ी हुई महसूस होती हैं. अगर लोगों को सस्ता और आसानी से उपलब्ध खाना पकाने का ईंधन मिले, तो जलावन के लिए पेड़ों पर निर्भरता कम की जा सकती है. इसके साथ ही गांव में अधिक से अधिक पौधे लगाने और बचे हुए पेड़ों को सुरक्षित रखने की जरूरत है.

ग्रामीणों का कहना है कि उन्हें भी अपने आसपास के वातावरण को स्वच्छ, हरा-भरा और सुंदर बनाए रखने के लिए प्रयास करना चाहिए. पेड़-पौधों को बचाने के साथ नए पौधे लगाने की पहल की जाए, ताकि आने वाली पीढ़ियों के लिए गांव में हरियाली और बेहतर पर्यावरण बना रहे.

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