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आखिर कब तक जलाई जाएंगी बेटियां

दहेज प्रताड़ना और घरेलू हिंसा की शिकार एक महिला की दर्दनाक कहानी, जो समाज के सामने यह सवाल खड़ा करती है कि आखिर कब तक बेटियां दहेज और भेदभाव की बलि चढ़ती रहेंगी। यह विशेष रिपोर्ट महिलाओं की सुरक्षा, न्याय और सामाजिक बदलाव की आवश्यकता पर प्रकाश डालती है।

आखिर कब तक जलाई जाएंगी बेटियां – दहेज प्रताड़ना और महिलाओं के खिलाफ हिंसा पर आधारित सांकेतिक फीचर इमेज, बिहार की ग्रामीण पृष्ठभूमि में पीड़ित महिला।
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👉बेटी दुल्हन बन कर गई थी, अधजली लाश बनकर लौटी

👉मुजफ्फरपुर के बंदरा प्रखंड के पीरापुर गांव की थी रितु

👉ऐसे संवेदनशील मामलों में भी पुलिस का रवैया क्यों रहता है उदासीन

✍️विजया भारती

बंदरा। यह वाकया बिहार के मुजफ्फरपुर जिले के बंदरा प्रखंडन्तर्गत पीरापुर गांव की है. इस गांव में रितु (बदला हुआ नाम) नाम की एक लड़की रहती थी. उसके परिवार में माता-पिता और पांच बहनें यानी कुल सात लोग रहते थे. वह परिवार बहुत गरीब है. उसके पिता ताड़ी बेचकर, खेती करके एवं मजदूरी करके किसी तरह परिवार चला रहे है. रितु समेत चार बहनों की शादी हो चुकी है. रितु परिवार की दूसरी बेटी थी. एक बहन अभी पढ़ाई कर रही है. रितु की शादी वैशाली जिले के चेहराकलां में हुई थी.

रितु के पिता ने लड़के वाले को कम दहेज़ दिया था. इसी कारण रितु को अक्सर ताने सुनने को मिलते थे. इसी बीच रितु को एक बेटी पैदा हुई. यह सुनकर ससुराल के लोग और भड़क गए. ससुराल के लोगों ने उसे जान से मारने की धमकी दी. डर के मारे रितु अपने मायके चली आई और ससुराल जाने से साफ़ इंकार कर दिया. लगभग एक साल तक वह मायके में ही रही. लेकिन कुछ दिन बाद माता-पिता ने उसे समझा-बुझा कर वापस ससुराल भेज दिया. दो-तीन बाद ही ससुराल वाले ने रितु के माता-पिता को फोन करके बताया कि आपकी बेटी बीमार है. वह अस्पताल में भर्ती है. यह सुनकर रितु के माता-पिता को शक हुआ. वे फ़ौरन बेटी के ससुराल पहुंचे, तो देखा कि घर में ताला लगा हुआ है. आस-पास जाने पर बेटी का अधजला शव मिला.

प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, जब रितु ससुराल पहुंची थी, तभी से ससुराल वालों ने उसे प्रताड़ित करना शुरू कर दिया था. जिस समय रितु के पिता को फोन आया था, उस समय वे लोग उसकी लाश को दो टुकड़ों में काट कर जला रहे थे. रितु के घर पर फोन करने के बाद वे सभी शव को बीच में ही जलता छोड़ फरार हो गए. घटना की प्राथमिकी दर्ज कराने के लिए भी रितु के माता-पिता को काफी मशक्कत करनी पड़ी. यह घटना पिछले साल जून-जुलाई की है.

माता-पिता न्याय के लिए लगातार संघर्ष कर रहे

रितु की शादी के लगभग ढाई-तीन साल हुए थे. रितु के माता-पिता का आरोप है कि दहेज़ के लिए उसकी हत्या कर पूरे परिवार ने मिलकर शव को छिपाने और मामले को दबाने की कोशिश की. आज भी रितु के माता-पिता अपनी बेटी को न्याय दिलाने के लिए लगातार संघर्ष कर रहे हैं, लेकिन सवाल है कि क्या उस बेटी को इंसाफ मिल पाएगा? क्या उनकी बेटी के हत्यारों को सजा मिलेगी? यह सवाल आज भी लोगों के मन में बना हुआ है.

पीरापुर के एक ग्रामीण ने बताया कि अब तक हत्यारोपितों की गिरफ़्तारी नहीं हुई है. वे सभी फरार चल रहे हैं. अभी कुछ महीने पहले रितु का हत्यारोपित पति अपनी मासूम बेटी को लेकर पीरापुर गांव पहुंचा था. यहां आकर उसने अपनी सास को फोन कर कहा कि अपनी नतिनी को ले जाइए, जैसे ही, इनलोगों ने कहा कि अभी पुलिस को फोन करते हैं. यह सुनते ही वह भाग गया. सवाल है कि उस मासूम बच्ची के भविष्य का क्या होगा?

क्या लें सीख :

इस घटना से हमें यह सीख लेने की जरूरत है कि जब आपकी बेटी को ससुराल वाले लगातार प्रताड़ित कर रहे हों और वह इस कारण ससुराल जाने से साफ़ मना करती है, तो बिना समाधान व समझौते के उसे जबरदस्ती ससुराल भेज कर मौत के मुंह में न धकेलें. रितु के पिता यदि उसके ससुराल पक्ष से समय रहते बातचीत कर लेते अथवा पंचायती करके समाधान निकालने की कोशिश करते, तो हो सकता है उसकी जान बच जाती. हो सकता था कि संबंध टूट जाता, लेकिन बेटी तो बच जाती.

कानूनी अथवा नैसर्गिक न्याय :

यह भी जान लें कि कानून कमजोर लोगों के लिए नहीं है. पुलिस उसी की सुनती है, जो दबंग है, सामाजिक रूप से मजबूत है, पैसे वाला है अथवा पैरवीदार. गरीबों की पहुंच कानून के रसूकदार रक्षकों तक शायद नहीं होती है. लेकिन यदि न्याय पाने की जिद हो, तो जरूर इंसाफ मिलता है. उम्मीद करते हैं कि रितु के हत्यारे को कानूनी नहीं, तो नैसर्गिक न्याय तो जरूर मिलेगा.

Photo credit: ChatGPT

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