मुजफ्फरपुर | अप्पन समाचार | पायल कुमारी

सुबह के पाँच बजे हैं। गाँव की पगडंडी पर हल्की ठंडी हवा बह रही है। खेत की मेड़ पर खड़ा किसान बार-बार आसमान की ओर देखता है। बादल तो दिखाई देते हैं, लेकिन बरसने का भरोसा नहीं। खेत तैयार हैं, बीज तैयार हैं, मजदूर भी इंतज़ार में हैं, मगर बारिश नहीं। हर गुजरते दिन के साथ किसान की चिंता बढ़ती जा रही है। उसे डर है कि यदि समय पर पानी नहीं गिरा, तो पूरे साल की मेहनत और उम्मीदें सूखी मिट्टी में ही दफन हो जाएँगी।
बिहार के अधिकांश ग्रामीण इलाकों में इन दिनों यही तस्वीर दिखाई दे रही है। धान की रोपाई का समय तेजी से निकल रहा है, लेकिन सामान्य से कम बारिश ने खेती की रफ्तार रोक दी है। किसान केवल फसल नहीं बोता, बल्कि अपने परिवार का भविष्य, बच्चों की पढ़ाई और पूरे साल की आजीविका भी उसी खेत में बोता है। इसलिए सूखा खेत केवल कृषि संकट नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक संकट का संकेत है।
बिहार में बारिश की स्थिति चिंताजनक
इस वर्ष मानसून के आगमन के बावजूद बिहार के अधिकांश जिलों में सामान्य से काफी कम वर्षा दर्ज की गई है। उपलब्ध आँकड़ों के अनुसार राज्य के 17 जिलों में 50 प्रतिशत या उससे अधिक वर्षा की कमी दर्ज की गई है, जबकि 18 जिलों में 30 से 50 प्रतिशत तक कम वर्षा हुई है। केवल तीन जिलों में वर्षा की कमी 13 से 30 प्रतिशत के बीच रही है।
सबसे अधिक वर्षा की कमी गया जिले में 68 प्रतिशत दर्ज की गई है।
बारिश की भारी कमी वाले प्रमुख जिले इस प्रकार हैं—
- गया – 68%
- सारण – 67%
- जहानाबाद – 65%
- भोजपुर – 61%
- नालंदा – 60%
- औरंगाबाद – 59%
- भागलपुर – 58%
- सहरसा – 57%
- अरवल – 56%
- पटना – 56%
- मुंगेर – 56%
- सीतामढ़ी – 55%
- बांका – 54%
- शेखपुरा – 54%
- मधेपुरा – 53%
- कैमूर (भभुआ) – 51%
पिछले एक सप्ताह में राज्य के कुछ हिस्सों में हुई बारिश से स्थिति में हल्का सुधार जरूर हुआ है। पहले जहाँ वर्षा की कमी लगभग 55 प्रतिशत तक पहुँच गई थी, वहीं अब यह घटकर लगभग 47 प्रतिशत रह गई है। इसके बावजूद धान की रोपाई अभी भी सामान्य से काफी पीछे चल रही है।
किसानों की बढ़ी चिंता
मुजफ्फरपुर जिले के गायघाट प्रखंड के ग्राम धुबौली (धोबौली) के किसान राजू उर्फ कनहाई बताते हैं कि इस बार बारिश की कमी ने खेती की पूरी योजना बिगाड़ दी है।
“हमने खेत की जुताई, बीज, खाद और मजदूरी पर पहले ही काफी पैसा खर्च कर दिया है। लेकिन समय पर बारिश नहीं होने से अब डीज़ल पंप के सहारे सिंचाई करनी पड़ रही है। डीज़ल की बढ़ती कीमतों ने खेती की लागत और बढ़ा दी है। अगर अगले कुछ दिनों में अच्छी बारिश नहीं हुई, तो धान की रोपाई पूरी करना मुश्किल हो जाएगा और फसल उत्पादन पर भी सीधा असर पड़ेगा।”
राजू उर्फ कनहाई बताते हैं कि गाँव के अधिकांश किसान वर्षा आधारित खेती करते हैं। बारिश नहीं होने से डीज़ल पंप के जरिए सिंचाई करनी पड़ रही है, जिससे खेती की लागत लगातार बढ़ रही है।
इसी गाँव के किसान संजीव राम का कहना है कि छोटे किसानों के सामने सबसे बड़ी चुनौती खेती बचाने की है।
“हम जैसे छोटे किसानों के लिए खेती ही परिवार की रोजी-रोटी का मुख्य आधार है। बारिश समय पर नहीं होने से धान की रोपाई प्रभावित हो रही है। यदि यही स्थिति बनी रही, तो केवल फसल ही नहीं, पूरे परिवार की आर्थिक स्थिति पर असर पड़ेगा। बच्चों की पढ़ाई, घर का खर्च और पहले से लिया गया कर्ज चुकाना भी कठिन हो जाएगा। सरकार को सिंचाई की बेहतर व्यवस्था और किसानों तक योजनाओं का लाभ समय पर पहुँचाना चाहिए।”
संजीव राम का कहना है कि केवल राहत राशि या मुआवजा देने से समस्या का स्थायी समाधान नहीं होगा। गाँव स्तर पर सिंचाई की मजबूत व्यवस्था, तालाबों का संरक्षण, वर्षा जल संचयन और किसानों को समय पर कृषि सहायता उपलब्ध कराना जरूरी है।
सबसे बड़ा संकट छोटे किसानों पर
बड़े किसान किसी तरह निजी बोरिंग या अन्य संसाधनों के माध्यम से सिंचाई कर लेते हैं, लेकिन छोटे और सीमांत किसान आज भी प्राकृतिक वर्षा पर निर्भर हैं। लगातार डीज़ल पंप चलाना उनके लिए आर्थिक रूप से आसान नहीं है।
खेती की शुरुआत में ही जुताई, बीज, मजदूरी, उर्वरक, दवाइयों और सिंचाई पर हजारों रुपये खर्च हो जाते हैं। ऐसे में बारिश की कमी किसानों को अतिरिक्त आर्थिक बोझ की ओर धकेल देती है। कई परिवार खेती बचाने के लिए कर्ज लेने को मजबूर हो जाते हैं। यदि धान की रोपाई समय पर नहीं हुई, तो इसका असर पूरे वर्ष की आय पर पड़ेगा।
जलवायु परिवर्तन की बढ़ती चुनौती
पिछले कुछ वर्षों में मौसम का स्वरूप तेजी से बदला है। कभी अत्यधिक बारिश और बाढ़, तो कभी लंबे समय तक सूखा। यही अनिश्चितता किसानों के सामने सबसे बड़ी चुनौती बन चुकी है।
जलवायु परिवर्तन अब केवल वैज्ञानिक चर्चा का विषय नहीं रह गया है। इसका सीधा असर खेतों, फसलों और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर दिखाई दे रहा है। किसान मौसम का चमत्कार नहीं, बल्कि भरोसेमंद पूर्वानुमान और समय पर आवश्यक सहायता चाहता है, ताकि वह अपनी खेती की बेहतर योजना बना सके।
समाधान केवल राहत नहीं, तैयारी भी
विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह की परिस्थितियों से निपटने के लिए दीर्घकालिक कृषि रणनीति अपनानी होगी। इसके तहत—
- वर्षा जल संचयन को बढ़ावा दिया जाए।
- तालाबों और पारंपरिक जल स्रोतों का पुनर्जीवन किया जाए।
- सामुदायिक सिंचाई व्यवस्था विकसित की जाए।
- सौर ऊर्जा आधारित सिंचाई को प्रोत्साहन मिले।
- छोटे एवं सीमांत किसानों को समय पर आसान ऋण, गुणवत्तापूर्ण बीज और फसल बीमा का लाभ मिले।
- मौसम आधारित कृषि सलाह गाँव-गाँव तक पहुँचाई जाए।
किसान केवल अन्नदाता नहीं, बल्कि देश की खाद्य सुरक्षा की सबसे मजबूत कड़ी है। जब किसान आसमान की ओर उम्मीद से देखता है और बादल बिना बरसे लौट जाते हैं, तब यह केवल उसकी व्यक्तिगत परेशानी नहीं रहती, बल्कि पूरे समाज और अर्थव्यवस्था की चिंता बन जाती है। मुजफ्फरपुर के गायघाट प्रखंड के ग्राम धुबौली सहित बिहार के हजारों गाँवों में किसान आज अच्छी बारिश का इंतजार कर रहे हैं। यह इंतजार केवल पानी का नहीं, बल्कि ऐसी कृषि व्यवस्था का भी है जो बदलते मौसम के बीच किसानों को सुरक्षित, सक्षम और आत्मनिर्भर बना सके।












