👉16 साल से बिना छत व गेट का है स्कूल का शौचालय
👉उत्क्रमित मध्य विद्यालय सोहांसा का है मामला
👉शिक्षिकाओं को शौच के लिए जाना पड़ता है बगल वाले घर में
👉शिकायतों के बाद भी विभाग नहीं कर रहा समाधान
✍️रिमझिम कुमारी की रिपोर्ट
पारू (मुज़फ्फरपुर)। जिले के पारू प्रखंड स्थित उत्क्रमित मध्य विद्यालय, सोहंसा में पढ़ने वाले छात्र-छात्राओं को पिछले करीब 16 वर्षों से अधूरे शौचालय की समस्या का सामना करना पड़ रहा है. विद्यालय परिसर में निर्मित शौचालय आज भी बिना छत व गेट का है. ऐसे में छात्राओं और शिक्षिकाओं को परेशानियों का सामना करना पड़ता है. बारिश और कड़ी धूप के दिनों में शौचालय का उपयोग करना मुश्किल हो जाता है. खुला शौचालय होने एवं असुरक्षा के कारण अधिकतर छात्राएं इसका इस्तेमाल करने से कतराती हैं.
स्थानीय लोगों के अनुसार, शौचालय का निर्माण वर्ष 2006 के बाद कराया गया था, लेकिन निर्माण कार्य अधूरा छोड़ दिया गया. वर्षों बीत जाने के बावजूद आज तक शौचालय के ऊपर न तो छत डाली गई और न ही गेट लगाया गया. बारिश के दौरान शौचालय के भीतर पानी भर जाता है, जबकि तेज धूप में इसका उपयोग करना कठिन हो जाता है.
विद्यालय में नामांकित बच्चों की संख्या भी काफी है. उपलब्ध जानकारी के अनुसार, विद्यालय में 120 लड़के और 150 लड़कियां यानी कुल 270 विद्यार्थी नामांकित हैं. छठी से आठवीं कक्षा में 40 लड़के और 70 लड़कियां यानी कुल 110 बच्चे नियमित विद्यालय पहुंचते हैं.
ग्रामीणों का कहना है कि विद्यालय में बुनियादी सुविधाओं की यह कमी बच्चों के शिक्षा के अधिकारों का उल्लंघन है. सरकार विद्यालयों में स्वच्छता और आधारभूत सुविधाओं को बेहतर बनाने के लिए अनेक योजनाएं चला रही हैं, लेकिन सोहांसा विद्यालय का अधूरा शौचालय इन योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन पर गंभीर सवाल खड़े करता है.
ग्रामीणों, अभिभावकों और विद्यालय परिवार ने शिक्षा विभाग एवं संबंधित अधिकारियों से मांग की है कि वर्षों से अधूरे पड़े शौचालय का निर्माण कार्य शीघ्र पूरा कराया जाए. उनका कहना है कि बच्चों, विशेषकर छात्राओं और शिक्षिकाओं के सम्मान, सुरक्षा और स्वास्थ्य को देखते हुए इस समस्या का तत्काल समाधान किया जाना चाहिए.
विद्यालय के प्रभारी प्रधानाध्यापक ने बताया कि इस समस्या की जानकारी कई बार विभागीय अधिकारियों को दी जा चुकी है. उन्होंने कहा कि कई बार जांच कर अधिकारी चले गए. हर बार यू-डायस (UDISE) में इसकी जानकारी भरकर भेजी जाती है, लेकिन आज तक कोई सुनवाई नहीं हुई. मजबूरी में टूटे हुए शौचालय से ही काम चलाना पड़ता है. इससे किशोरियों के साथ-साथ शिक्षिकाओं को भी काफी दिक्कत होती है. शिक्षिकाओं को आवश्यकता पड़ने पर विद्यालय के पास स्थित एक घर में जाकर शौचालय का उपयोग करना पड़ता है. कई छात्राओं ने बताया कि मासिक धर्म (पीरियड) के दौरान हम विद्यालय नहीं आते हैं. ऐसा वे इसलिए करती हैं, क्योंकि उनके लिए सुरक्षित, स्वच्छ और सम्मानजनक शौचालय की व्यवस्था उपलब्ध नहीं है. इसका सीधा असर उनकी पढ़ाई, स्वास्थ्य और नियमित उपस्थिति पर पड़ रहा है.











